जिस थाने में कभी कांस्टेबल के रूप में किया काम, ढाई दशक बाद जब VVIP के रूप में पहुंचे किसान नेता राकेश टिकैत, मच गया हड़कंप

जिस थाने में कभी कांस्टेबल के रूप में किया काम, ढाई दशक बाद जब VVIP के रूप में पहुंचे किसान नेता राकेश टिकैत, मच गया हड़कंप

NEW DELHI : देश में राकेश टिकैत का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 11 महीने से किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे राकेश टिकैत की गिनती वीवीआईपी लोगों में होती है। वह जहां जाते हैं तो वहां की सुरक्षा  बढ़ा दी जाती है। ऐस ही अचानक राकेश टिकैत शुक्रवार को नई दिल्ली के आरके पूरम थाने पहुंच गए। टिकैत के थाने पहुंचने पर वहां गहमागहमी शुरू हो गई।

साउथ दिल्ली के थाने में पहुंचते ही वहां मौजूद पुलिस वालों में इस बात को लेकर के कौतूहल था कि किसान नेता अचानक उनके थाने पर क्यों चले आए. तत्काल डीसीपी को भी इसकी जानकारी दे दी गई कि किसान नेता राकेश टिकैत थाने में धमक आए हैं.किसान आंदोलन के मद्देनजर दिल्ली में राकेश टिकैत की किसी थाने में एंट्री को लेकर बवाल मचना लाजमी था.तुरंत सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी गई।

टिकैत ने बताया कि लखीमपुर खीरी मामले में एक वरिष्ठ किसान नेता तेजिंदर सिंह विर्क को गंभीर चोट आई है और उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उन्ही से मिलने के लिए वह अस्पताल जा रहे थे। इसी दौरान रास्ते में थाने का भवन देख पुरानी यादें ताजा करने के लिए वह पहुंच गए।

आरके पूरम थाने से है टिकैत का गहरा रिश्ता

आरके पूरम थाना पहुंचने के बाद टिकैत ने 25 साल पुरानी अपनी यादें तेज की। थाने में काम करनेवाले पुलिसकर्मियों के उन्होंने बताया कि 25 साल पहले वो इसी थाने में बतौर कॉन्स्टेबल काम करते थे.पुलिसवालों को इतना ही सुनना था कि वहां पर मौजूद सभी पुलिसवालों ने बड़े अच्छे तरीके से उनका सत्कार भी दिया. वो कहते हैं कि वह बेशक किसान नेता बन गए हो लेकिन उन्हें यह बिल्डिंग अभी याद थी जहां पर उन्होंने तकरीबन 5 साल तक काम किया था।

बम स्क्वायड दल का थे हिस्सा

दरअसल, राकेश टिकैत की भर्ती दिल्ली पुलिस के बम स्क्वायड में साल 1991 में हुई थी और उनकी पोस्टिंग आरके पुरम थाने में हुई. जहां लगभग 5 साल तक यानी सन 91 से लेकर 96 तक वह बतौर कॉन्सटेबल काम करते रहे. बम दस्ते में बतौर सिपाही काम करने पर टिकैत यह भी बताते हैं कि उस समय कहीं भी बम की सूचना मिलने पर उन्हें जाना पड़ता था और एक ऐसा ही वाकया तब दिल्ली के ग्रामीण इलाके नजफगढ़ में भी हुआ था.

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