‘सत्ता के लिए टोपी पहनने और टीका लगाने’ वाले नीतीश ने अब अगड़ों और पिछड़ों को साधने की चली चाल ... जदयू ने बनाई कमाल की योजना

‘सत्ता के लिए टोपी पहनने और टीका लगाने’ वाले नीतीश ने अब अगड़ों और पिछड़ों को साधने की चली चाल ... जदयू ने बनाई कमाल की योजना

पटना. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (मौजूदा प्रधानमंत्री) की ओर संकेत करते हुए कहा था कि सत्ता के लिए टोपी भी पहननी होगी और टीका भी लगाना होगा. नीतीश ने तब जो बातें कही थी वह सभी धर्मों के लिए राजनीतिक दलों के समदर्शी होने की ओर इशारा था. लेकिन 10 साल बाद अब लगता है कि नीतीश कुमार की राजनीति में सभी जातियों को जदयू के लिए एकजुट करने की योजना है. इसे समझने के लिए जदयू नेताओ की ओर से किए जा रहे दो बड़े आयोजनों पर ध्यान देना होगा. 

जदयू नेता संजय सिंह की अगुवाई में सोमवार को महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही है. पटना में आयोजित इस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित जदयू के सभी बड़े नेता शामिल हो रहे हैं. विशेषकर राजपूत समाज के तमाम बड़े चेहरों को एक मंच पर लाने की तैयारी की गई है. सभी जिलों से राजपूत बिरादरी के लोगों को पटना लाने के लिए कई दिनों से तैयारी की जा रही थी. माना जा रहा है कि इस आयोजन के बहाने जदयू की कोशिश राजपूत वोटों को एकजुट करना है. 

दरअसल, माना जाता है कि बिहार में राजपूत बिरादरी की आबादी करीब 6 से 7 फीसदी है. इसमें एक बड़ा वोट प्रतिशत लम्बे समय से राजद और भाजपा के साथ रहा है. हालांकि जदयू के भी कई बड़े चेहरे राजपूत रहे हैं. लेकिन जिस तरह से शाहाबाद के इलाके में राजद और भाजपा को जीत मिलती रही है उसका एक बड़ा कारण राजपूतों का इन दोनों दलों के साथ रहना माना जाता है. ऐसे में इस बड़े वोट प्रतिशत और प्रभावशाली जाति राजपूत को अपने पाले में करने के लिए महाराणा प्रताप की जयंती से बड़ा संदेश दिया जा रहा है. 

वहीं जदयू की ओर से ही 24 जनवरी को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती वृहद स्तर पर मनाई जा रही है. इसे लेकर राज्य के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर आयोजन की योजना है. चुकी कर्पूरी ठाकुर समाजवादी विचारधारा वाले नेता थे. लेकिन उनका पिछड़ा और अति पिछड़ा जाति से आना उनकी जयंती के बहाने पिछड़ों की राजनीतिक को साधने की कोशिश भी है. नीतीश की पार्टी का कोर वोट बैंक यही जातियां रही हैं. ऐसे में इस जयंती के बहाने अब जदयू बिहार के पिछडो और अति पिछड़ो को साधने की बड़ी रणनीति में भी जुट गई है. 

नीतीश की पार्टी के इन दो बड़े आयोजनों के अलावा इस साल कई अन्य जयंती को बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी है. इसे वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले सभी जातियों को जदयू से जोड़ने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है. अगर नीतीश की पार्टी इसमें सफल होती है तो इसका बड़ा फायदा लोकसभा चुनाव 2024 और विधानसभा चुनाव 2025 में पार्टी को हो सकता है. इसमें नीतीश कुछ उसी तरह की रणनीति पर आगे बढना चाहते हैं जैसे वे 2013 में मुस्लिमों को जोड़ने के लिए तिलक और टोपी पहनने की बात किए थे. अब अगड़ों और पिछड़ों को उसी तरह पर जदयू के लिए साथ लाने की कवायद होगी. 


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