कोरोना संकट की इस घड़ी में अभिभावक और स्कूल प्रंबंधन को एकजुट होकर लड़नी होगी लड़ाई,ताकि स्कूल और छात्र दोनो की सेहत बनी रहे

कोरोना संकट की इस घड़ी में अभिभावक और स्कूल प्रंबंधन को एकजुट होकर लड़नी होगी लड़ाई,ताकि स्कूल और छात्र दोनो की सेहत बनी रहे

DESK: इस बात पर तो सर्वसम्मति है ही, कि हम सभी वैश्विक मंदी की ओर बढ़ रहे है, फिर आने वाली विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने को हम तैयार क्यो नही हो रहे.? यह आवश्यक है कि, कुछ बातों पर ऊपरी तह से तनिक नीचे उतर कर सोचा जाए.! इधर लगातार किसी न किसी माध्यम से अभिभावकों और विद्यालय संचालकों से सम्पर्क बना ही हुआ है, कई अभिभावकों ने भी कहा, कि इस कठिन समय मे आप हमारे पक्ष में क्यों नही लिखते.? साथ ही विद्यालय संचालकों से बातचीत के दौरान भी कमोबेश यही उलाहना.!

शिक्षा से जुड़ा हुआ हूँ, इसका मतलब तो यह कभी नही कि, अकूत ज्ञान का भण्डार है मेरे पास.! कई प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के संचालन से जुड़े होने के साथ ही, बड़े स्तर के नामचीन विद्यालयों से भी जुड़ाव गहरा है.! दर्जनाधिक विद्यालयों से जुड़ाव के कारण, हजाराधिक अभिभावकों से सीधा सम्पर्क भी स्वाभाविक ही हो जाता है, साथ ही सैकड़ो शिक्षकों और शिक्षकेत्तर सहकर्मियों से तो संवाद चलता ही होता है.! 

इधर पिछले कुछ दिनों से विद्यालयों के लिए कई दिशानिर्देशों की बात गाहेबगाहे सतह पर उप्लावित होती रहती है, कभी किसी सरकारी अध्यादेश की कोई प्रति या फिर कभी, किसी अभिभावकों के संघ की ओर से प्रतिवेदन.! यह सही है, कि इस आपदा काल मे जानमाल के बाद, हमारी अर्थव्यवस्था ही है, जिसका भारी नुकसान हुआ है.! यह सोचना भी कठिन कि, आने वाले कितने काल मे हम और हमारी अर्थव्यवस्था सही गति से पटरी पर दौड़े तो बढिया, कम से कम चल पाएगी.! 

जहाँ ये खबरें डराती है, कि फलाने देश मे या फलाने राज्य में इस समय तक हज़ारों नौकरियाँ जा चुकी, या अगर स्थिति नियन्त्रित नही हुई, तो ईश्वर न करे, हज़ारों की संख्या में नौकरियों पर खतरा तो है ही.! मैंने आरम्भ से ही कितने ही सेमिनारों में और आलेखों में इस बात पर जोर दिया है कि, कम से कम शिक्षा और स्वास्थ्य को हर काल मे संरक्षित करने की गहरी आवश्यकता है, तभी आगामी स्वर्णिम भविष्य की परिकल्पना करनी ही सही होगी.!

इस आपदा काल मे, सभी शैक्षणिक संस्थान बन्द पड़े है, सभी शिक्षार्थी भी घरों में ही.! 

अभिभावको के समूह का यह कहना भी उचित कि, जब शैक्षणिक संस्थान बन्द पड़े है, बच्चे संस्थान जा ही नही रहे, तो आखिर फिर शिक्षण-शुल्क का क्या औचित्य.? शिक्षण संस्थान के संचालकों की यह दलील भी सही कि, आखिर जब भी संस्थान खुलेंगे, तो कोई भी ऐसा खर्च तो नही है, जिसको खत्म कर दिया जा सके.? भले ही शिक्षकों के वेतन इस अवधि में पूरा नही दिए जाएं, बिजली के बिल अभी जमा नही किये जायें, बैंक लोन की किश्तों को तीन महीने तक जमा नही करने की सहूलियत दी गयी हो, गाड़ियों के सरकारी करों को अभी जमा नही करने की सहूलियत दी गयी हो, पर क्या संस्थान खुलने के बाद, इन सभी खर्चो को पूरा नही करना होगा.? ध्यान रखना होगा, कि अभी जमा नही करने की सहूलियत मात्र दी गयी है, इन खर्चो से मुक्त नही किया गया है.! 

सरकार से यह अपेक्षा तो हो ही सकती है, कि आपदा-काल के दौरान बैंक लोन का ब्याज छोड़ दिया जाए, गाड़ियों के खड़े रहने के दौरान करों में रियायत हो, संस्थान के बन्दी काल के बिजली बिलों में छूट दी जाए, या कुछ ऐसे अन्य सरकारी कर, जिससे संस्थान पर एक अनकहा दवाब बनता हो.! अभिभावकों में से भी, जिन अभिभावकों को अभी पूरा वेतनमान नही भी मिल रहा हो, देर-सबेर तो मिलेगा ही, फिर उन आगामी अनुकूल स्थितयों में क्या सम्भव हो पायेगा, इस पर दृष्टित होने की गहन आवश्यकता है.!

एक बात और समझ मे आती है कि, इस समय जहाँ पूरा राष्ट्र ही अपने-अपने घरों में है, न तो कोई अन्य खर्चो की गुंजाइश है, क्योंकि सभी रेस्टॉरेंट्स, सिनेमा, दुकानें और मनोरंजन केन्द्र बन्द ही है, फिर इन परिस्थितियों में क्या इस पर विचारोभियुक्ति नही होनी चाहिए कि, सभी मिलकर अपने खर्चो के बजट पर भी मन्थन करे, और सोचे.? हर परिवार अपने-अपने अर्थ साधनों में हर वर्ष बढ़ोतरी चाहता है, ताकि बढ़ते हुए खर्चो से तारतम्य स्थापित कर सके, जिसका प्रतिफल ही तो है, कि सरकारी या निजी संस्थानों में हर वर्ष वेतनमान की बढ़ोतरी, और जिसका सीधा प्रभाव होता है, समाज के दूसरे पक्ष पर.! सरकारी खर्च बढ़ते है, तो जनता पर करो की दरों में इजाफा, और निजी संस्थानों में खर्च बढ़ते है, तो उपभोक्ताओं से लेनदारी में बढ़त.! 

संस्थानों की अपनी बाध्यता होती है, कि हर वर्ष अपने कर्मचारियों के वेतनमान को बढाने की, क्योकि अगर यह नही किया गया, तो कर्मचारियों की भीड़ किसी दूसरे संस्थान की ओर, जहाँ बढ़ोतरी हुई है.! मैंने अपने प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के शिक्षकों से इस पर चर्चा की, क्या यह सम्भव हो सकता है कि, अगर इस आपदा के समय बच्चों के शिक्षण-शुल्क को न बढाया जाए, क्योंकि अभिभावकों की आर्थिक हालात पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है.! अगर शुल्क नही बढ़ाये जाये, तो इस पूरे वर्ष में शिक्षकों के वेतनमान में भी कोई बढ़ोतरी नही की जाए, साथ ही कुछ अन्यावश्यक खर्चो पर भी कटौती की जाए.! 

यकीन मानिए, सभी शिक्षकों ने एक स्वर से इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया कि, इस पूरे शैक्षिक वर्ष में न तो शुल्क ही बढ़ाये जायें, और न ही किसी के वेतनमान में भी कोई बढ़ोतरी की जाए.! 

जब इसकी सूचना अभिभावकों को मिली, यकीन कीजिये, दुआओं का भण्डार था, सभी विद्यालय-प्रमुखों के पास.! 

जब इस आपदा में खर्च भी कम हो रहे, तो आमदनी को बढाने पर तनिक नियन्त्रित भाव से ही मनन करना होगा, क्योंकि अभी इस संकट-काल मे धन का अति-उपार्जन आवश्यक नही,परन्तु धन की धीमी गति से प्रवाह ही आवश्यक है, जीने के लिए.! अगर शुल्क नही बढाने का निर्णय संस्थान प्रबन्धन लेते है, तो सरकार की ओर से भी एक हाथ सहयोग का बढ़ना ही चाहिए, तभी संस्थान और अभिभावक एक सुर में भविष्य का संगीत गुनगुना सकेंगे.! शिक्षकों को तो शिक्षण-कार्य मे संलिप्तता हो जाती है, उनकी आर्थिक व्यवस्था भी कमोबेश हो ही जाएगी, पर सोचना होगा, उन लोगो के लिए, जिनकी सेवा चतुर्थवर्गीय श्रेणी में आती है,या जो हर दिन कार्यापरान्त ही अपने देहरी के चूल्हे में आग देखते है.! 

न तो मैं कोई सरकारी अधिकारी हूँ, न ही सरकार के नीतिनिर्माताओं में मेरी सहभागिता होती है.! इतना जरूर इंगित करना चाहता हूँ, कि जिन अभिभावकों के पास, शिक्षण-शुल्क देने के लिये अर्थाभाव हो, उन्हें मदद की आवश्यकता है, भले ही सरकारी स्तर पर, या किसी अन्य विधाओं से भी, पर संस्थानों में शुल्क के अभाव में बन्दी हो जाए, यह एक गहरा और घातक प्रहार होगा, अपने राष्ट्र के स्वर्णिमता की ओर, जाने वाले मार्ग पर.!

टूटी पुलिया बाद में बन सकती है, बन्द कारखाने भी बाद में खुल सकते है, एक्सप्रेस हाइवे और बड़े डैम अगर कुछ वर्षों के बाद भी बने, तो कोई बात नही.! एकबार अगर हमारी सांस्कृतिक शैक्षणिक व्यवस्था ध्वस्त हो गयी न, या फिर हमारे स्वास्थ्य प्रणाली की व्यवस्था पर गंभीर संकट आ जाये, तो यकीन मानिए, न तो कुछ देखने को बचेगा, और न ही कोई स्वस्थ आँखे ही होंगी, इन्हें देखने को.! 

अभिभावकों से भी आग्रह कि, इस संकट के समय संस्थान के साथ खड़े हो, ताकि संस्थानों का बचाव ही आनेवाली नयी पीढ़ी को संवारेगा.! अगर शुल्क जमा करने में कोई असुविधाजनक स्थिति बनती हो, तो संस्थान के टेबल पर एक कप चाय के साथ तो बड़ी से बड़ी समस्याओं का निदान सम्भव है.! अभिभावकों और प्रबन्धन को टेबल के दो तरफ नही, एक ही तरफ साथ बैठ कर, टेबल के दूसरी तरफ समस्याओं से एकसाथ लड़ना होगा, तभी सफलता भी होगी.! 

कम से कम इतनी धनराशि की व्यवस्था तो हो ही जाए, कि सभी सहकर्मियों को थोड़ा बहुत भी देकर, चूल्हे को जलाए रखे जाएँ.!  संस्थाओं से भी यह आग्रह कि, इस आपदा-काल मे, अपने रोजनामचे के खर्चो के साथ ही सभी सहकर्मियों को विश्वास में लें, कि  इस वर्ष वेतनमान में बढ़ोतरी के लिए वायदे नही लिए जायें, क्योकि अभी बढ़ोतरी से इतर, नौकरियों को बचाने की गहरी आवश्यकता है.! संस्थान यह भी कर सकते है कि, अपने-अपने क्षेत्र में जिन परिवारों का रोजगार खत्म हो गया हो, कम से कम कुछ समय के लिए, उन परिवारों को अपना कर, छोटे बच्चों की निःशुल्क शिक्षा और चूल्हे जलने भर की मदद करें.! 

अधिक वृहत स्तर पर नही, एकाध परिवारों को तो मदद दी ही जा सकती है.! 

एकतरफ सरकार ने भी तो, अपने कर्मचारियों के वेतनमान में पूरे वर्ष के लिए कटौती की घोषणा की है, तो फिर हम सब मिलकर, एक ऐसे समाज मे सहभागी तो हो ही सकते है, जहाँ किसी का रोजगार न खत्म हो, और कम से कम कोइ चुल्हा ठंडा नही हो.! अपने व्यक्तिगत स्तर से, जितना कुछ सम्भव है, कोशिश कर रहा हूँ, क्योंकि जब वे पेट भरकर सोएंगे, तभी आपको भी भरी नीन्द आएगी.!मन की बातों को लिख दिया गया है, न ही इन बातों को मानने की बाध्यता है, और न ही इस पर कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी की अपेक्षा है, मित्रो.!  अपना ख्याल रखिये, यह कठिन समय भी निकल जायेगा.! 

-अरुणोदय

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