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विशेष राज्य का दर्जा सहूलियत की राजनीति नहीं है न नीतीश जी! 15 वर्षों से सत्ता में हैं लगातार, फिर भी पिछड़ा होने की लगा रहे हैं गुहार

विशेष राज्य का दर्जा सहूलियत की राजनीति नहीं है न नीतीश जी! 15 वर्षों से सत्ता में हैं लगातार, फिर भी पिछड़ा होने की लगा रहे हैं गुहार

हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट आई थी, उसमें बिहार को विकास के विभिन्न पैमानों पर फिसड्डी दिखाया गया है. चाहे शिक्षा हो या कुपोषण या फिर स्वास्थ्य और ढांचागत विकास परियोजनाएं. नीति आयोग की रिपोर्ट ने बिहार में सत्तारूढ़ जदयू और भाजपा के बीच तल्खी भी बढ़ा दी है. इसी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की ओर से एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की जाने लगी है. 

संयोग से पिछले 15 वर्षों से ज्यादा समय से राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं. नीतीश कुमार और जदयू की ओर से बिहार में अपने शासनकाल को सुशासन भी बताया जाता है. बावजूद इसके नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकार के दावों और हकीकत की कलई खोल दी है. साथ ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के नाम पर राजनीती भी होने लगी है. सवाल लाजमी है कि नीतीश कुमार के दावों के अनुरूप जब बिहार विकास के विभिन्न मापदंडों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है तब राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलने की जरूरत है. 

इसमें कोई दो राय नहीं केंद्र सरकार की रिपोर्ट में ही बिहार को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल किया गया है. लेकिन, नीतीश कुमार की ओर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मांगने का समय और मुद्दा राजनीती से भी प्रेरित रहा है. वर्ष 2005 में सत्ता संभालने के बाद अगले पांच साल तक नीतीश कुमार की ओर से विशेष राज्य की बात नहीं की गई थी. 2010 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के करीब डेढ़-दो साल बाद जब नीतीश कुमार और भाजपा की तल्खी बढ़ने लगी तब पहले पहल सार्वनिक रूप से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठी. जैसे जैसे भाजपा और नीतीश में दूरियां बढ़ती गई वैसे वैसे विशेष राज्य का मुद्दा पर ज्यादा जोर पकड़ता रहा. वहीं 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तब भी बिहार के विशेष दर्जे की मांग उठी. इसी बीच 2015 बिहार विधानसभा के पहले नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक जनसभा में बिहार के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की थी. हालाँकि केंद्र की रिपोर्ट कहती है कि विशेष पैकेज में घोषित कई कार्य अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसका एक बड़ा कारण राज्य सरकार की ओर से परियोजनाओं को लंबित रखना भी बताया गया है. वहीं जिन मानकों पर विकास कार्य हुए वे भी अन्य राज्यों की तुलना में पीछे है. जो नीति आयोग की रिपोर्ट में भी बताया गया है और शिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य आदि के मामलों में राज्य को पिछड़ा बताया गया है. 

यह भी गौर करने वाली बात है कि 2015 विधानसभा चुनाव के बाद जब राजद के साथ नीतीश कुमार की कुछ मुद्दों पर नहीं बनी और दोनों अलग हुए तब भाजपा के साथ आए नीतीश कुमार ने एक बार भी विशेष राज्य का शर्त नहीं रखा था. यहाँ तक कि पिछले करीब पांच साल से यह मुद्दा गौण ही रहा है लेकिन अचानक से विशेष राज्य के मांग के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है. इसका बड़ा कारण 2015 के बाद नीतीश कुमार की कमजोर हुई राजनीतिक पकड़ को माना जा सकता है. 2019 का लोकसभा चुनाव हो या 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव दोनों में जदयू को अपेक्षित सफलता नहीं मिली. 

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका बड़ा कारण पिछले कुछ समय से जदयू और भाजपा के बीच के बढ़ रही दूरियां भी हैं. दोनों दलों के नेताओं के बीच कई मुद्दों पर तल्खी देखी जा चुकी है. संभव है भाजपा के आक्रमक रुख को कुंद करने के लिए नीतीश कुमार की ओर से एक बार फिर से विशेष राज्य का मुद्दा उछाला गया है. इसी बहाने जदयू अपनी कमजोर हुई राजनीतिक जमीन को राज्य में फिर से मजबूत करने की तैयारी में है. बिहार को पिछड़ेपन से बाहर निकालने के लिए विशेष राज्य की महत्ता बताकर इससे भावनात्मक समर्थन हासिल किया जा सकता है. हालाँकि कुछ जवाब जदयू को भी देने की जरूरत है. जब 15 साल से सत्ता में रहने और लम्बे समय से केंद्र की सत्ता में साझीदार रहने के बाद भी जब राज्य में विकास तय मानकों के अनुरूप नहीं हो रहा है तो विशेष राज्य का दर्जा क्या बड़ा बदलाव करेगा. भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, अफसरशाही की शिकायतें आम हैं जो बिहार के विकास में ब्रेकर का काम कर रहे हैं, जरुरुत इसमें सुधार करने की है. अपराध मुक्त बिहार ही निवेश हितैषी बिहार की परिकल्पना को साकार करेगा लेकिन 15 साल में राज्य को लेकर यह भरोसा नहीं जगा है. तो स्वभाविक है विशेष राज्य का दर्जा तभी राज्य के लिए फलीभूत होता जब अन्य व्यवस्थाएं सुधरेंगी. सहूलियत की राजनीती के बदले जरूरी मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित किया जाए. 

हालाँकि विशेष राज्य का दर्जा पाने वाले राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा दी गई राशि में 90% अनुदान और 10% रकम बिना ब्याज के कर्ज के तौर पर मिलती है. जबकि दूसरी श्रेणी के राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा 30% राशि अनुदान के रूप में और 70% राशि कर्ज के रूप में दी जाती है. इसके अलावा विशेष राज्यों को एक्साइज, कस्टम, कॉर्पोरेट, इनकम टैक्स आदि में भी रियायत मिलती है. केंद्रीय बजट में प्लान्ड खर्च का 30% हिस्सा विशेष राज्यों को मिलता है. विशेष राज्यों द्वारा खर्च नहीं हुआ पैसा अगले वित्त वर्ष के लिए जारी हो जाता है. ये सारे लाभ अगर वास्तव में बिहार चाहता है तो राजनीतिक दलों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी. उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि तर्कों और तथ्यों के आधार पर बिहार के भले के लिए केंद्र पर दवाब बनाना होगा, तभी बिहार का कल्याण होगा.