'कुशवाहा' पर शंका ! विलय के 21 महीने बाद भी 'उपेन्द्र' को देनी पड़ रही सफाई, राजनीतिक धुंध छांटने को आना पड़ा सामने

'कुशवाहा' पर शंका ! विलय के 21 महीने बाद भी 'उपेन्द्र' को देनी पड़ रही सफाई, राजनीतिक धुंध छांटने को आना पड़ा सामने

PATNA: बिहार की राजनीति में जेडीयू ससंदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा को शंका भरी नजरों से देखा जा रहा है। न सिर्फ पार्टी के अंदर बल्कि दूसरे दलों में भी। कुशवाहा ने 14 मार्च 2021 को नीतीश कुमार के समक्ष अपनी पार्टी रालोसपा का विलय जेडीय़ू में किया था। विलय के करीब दो साल होने को हैं, बावजूद इसके कुशवाहा को सफाई देनी पड़ रही है कि वे नीतीश के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं. आखिल उपेन्द्र कुशवाहा पर सवाल क्यों उठ रहे ? आखिर पार्टी के नंबर-3 नेता को शक की निगाह से क्यों देखा जा रहा? इसके पीछे कई तरह के तर्क दिये जा रहे।   

कुशवाहा के राजनीतिक भविष्य पर तरह-तरह की चर्चा   

उपेन्द्र कुशवाहा आज भी सवालों के घेरे में हैं। शंका है कि वे फिर से जेडीयू का दामन छोड़ सकते हैं. राजनीति गलियारे में यह चर्चा आम है कि लोकसभा चुनाव से पहले उपेन्द्र कुशवाहा फिर से भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। इसके पीछे तरह-तरह के तर्क दिये जा रहे। नीतीश कैबिनेट में शामिल नहीं किये जाने को लेकर भी असंतोष की बात कही जा रही है। उपेन्द्र कुशवाहा का हालिया कुछ बयान भी इस चर्चा में आग में घी का काम किया है. चाहे शराबबंदी पर बयान हो या फिर कुढ़नी विस उप चुनाव में पार्टी की करारी हार हो। उपेन्द्र कुशवाहा ने खुलकर अपनी बात रखी है। जेडीय़ू संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दाय़ित्व संभालने के बाद भी वे एक सामाजिक संगठन के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं. लिहाजा शक की सूई और गहरा रही है. राजनीतिक गलियारे में सुलगते सवालों के बाद आज उपेन्द्र कुशवाहा सामने आए और स्थिति स्पष्ट की। 

कुशवाहा की सफाई, नीतीश के साथ खड़े हैं और रहेंगे 

जेडीयू प्रदेश कार्यालय में प्रेस कांफ्रेंस कर उपेन्द्र कुशवाहा ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा,'' मेरे जैसा आदमी स्वस्थ राजनीति की बात करता है. गंदी राजनीति की बात हम कभी नहीं करते हैं. स्वस्थ्य राजनीति यही कहती है कि जो कमिटमेंट है उसके प्रति मुस्तैदी से खड़े रहिए. अगर कहीं कुछ लगता हो तो उस पर जरूर आपत्ति दर्ज करिए. लेकिन उसको अलग तरीके से अर्थ निकालना किसी के लिए ठीक नहीं है. तमाम राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को ऐसा होना चाहिए कि पार्टी के प्रति पूरी वफादारी और निष्ठा हो. लेकिन समाज के प्रति जो कमिटमेंट है उस कमिटमेंट को जरूर याद रखें. इसी को याद रखने के कारण हम नीतीश कुमार के नेतृत्व में आस्था व्य़क्त किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही कमिटमेंट को पूरा करना संभव है. इसी कारण हम पार्टी में आए हैं और मजबूती से खड़े हैं और रहेंगे. इतना हम आपको आश्वस्त करते हैं. बहुत दुखी मन से यह बात करनी पड़ रही है कि आज की तारीख में भी हमें इस बात को कहने को जरूरत पड़ रही है. कहने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन जिस तरीके से प्रकाशित-प्रसारित किया जा रहा है, इस वजह से दुखी मन से हम कह रहे हैं. वरना कहने की जरूरत भी नहीं थी. सब लोगों को मालूम है कि मेरा कमिटमेंट क्या है...। दरअसल, मीडिया में यह खबर चली है कि खऱमास के बाद उपेन्द्र कुशवाहा कोई बड़ा निर्णय ले सकते हैं। इसके पीछे कई तर्क दिये जा रहे। एक बड़ा तर्क यह दिया जा रहा कि पार्टी के अंदर कुशवाहा को भाव नहीं दिया जा रहा.इस वजह से वे अंदर ही अंदर नाराज हैं. हालिया बयान और उनके राजनीतिक इतिहास को आधार बनाकर कयास लगाये जा रहे। 

कुशवाहा ने 2021 में अपनी पार्टी का जेडीयू में किया है विलय 

उपेन्द्र कुशवाहा 2021 में जेडीयू में शामिल हुए। अपनी पार्टी रालोसपा का जेडीयू में विलय की घोषणा करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था कि यह देश और राज्य के हित में है. उन्होंने कहा कि विलय वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति की मांग थी. उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, ''नीतीश कुमार मेरे बड़े भाई की तरह हैं. मैंने व्यक्तिगत रूप से हमेशा उनका सम्मान किया है. इसके पहले वे 2013 में जेडीयू से अलग हुए थे और अलग पार्टी बनाई थी. साल 2014 में कुशवाहा एनडीए में शामिल हो गए थे, जबकि नीतीश कुमार आरजेडी के साथ चले गए थे. 2014 में उपेंद्र कुशवाहा को तीन लोकसभा सीटें बिहार में मिली थीं और सभी पर जीत हुई थी. कुशवाहा मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मंत्री भी बनाए गए. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन महज़ तीन सीटों पर ही वो खाता खोल पाई थी.इसके बाद साल 2018 में कुशवाहा एनडीए से अलग हो गए थे.

साल 2000 के विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा ने जंदाहा सीट से ही चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। चुनाव जीतने के बाद कुशवाहा, नीतीश कुमार के करीब आ गए। इसी का नतीजा था कि साल 2004 में जब सुशील मोदी लोकसभा चुनाव जीतकर केन्द्र में चले गए तो नीतीश के समर्थन से कुशवाहा बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिए गए। इसके बाद इन्हें बिहार के भावी सीएम की कतार में भी गिना जाने लगा. 2005 में हुए विधानसभा के पहले चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा जंदाहा सीट से चुनाव हार गए। उस चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और जोड़-तोड़ करने के बाद भी कोई पार्टी सरकार नहीं बना पायी। इसके बाद अक्टूबर 2005 में ही फिर से चुनाव हुए, लेकिन इस बार दलसिंहपुर सीट से उपेन्द्र कुशवाहा चुनाव हार गये. हार की वजह से नीतीश सरकार में इन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका। 

2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के नेतृत्व में जदयू-भाजपा की सरकार बनी. उपेन्द्र कुशवाहा को इसमें जगह नहीं मिली। माना जाता है कि तभी से ही दोनों नेताओं के बीच मनमुटाव की शुरुआत हो गई थी। इसके बाद कुशवाहा ने नीतीश का साथ छोड़कर एनसीपी की सदस्यता ग्रहण कर ली। एनसीपी ने उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हुई हमलों की घटनाओं के बाद कुशवाहा ने एनसीपी भी छोड़ दी। साल 2009 में कुशवाहा की फिर से जदयू में एंट्री हुई और पार्टी ने उन्हें 2010 में राज्यसभा भी भेज दिया, लेकिन उस दौरान भी पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी करने के चलते उन्हें फिर से जदयू छोड़नी पड़ी। साल 2013 में उपेन्द्र कुशवाहा ने जेडीयू को छोड़कर जोरदार तरीके से पटना के गांधी मैदान से नई पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के गठन का ऐलान किया. 

 

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