शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से बिहार सरकार को लगाई फटकार, बहुत सुनाया, कानून पर फिर उठे सवाल

शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से बिहार सरकार को लगाई फटकार, बहुत सुनाया, कानून पर फिर उठे सवाल

NEW DEHLI : बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर मौजूदा सरकार गर्व करती है। लेकिन, इस कानून के कारण देश की न्याय व्यवस्था पर जो प्रभाव पड़ा है, उसको लेकर देश का सर्वोच्च न्यायालय खासा नाराज है। जहां कुछ दिन पहले मुख्य न्यायाधीश ने अमरावती में एक कार्यक्रम में शराबबंदी कानून में दूरदर्शिता की कमी बताया था। वहीं एक बार फिर से मुख्य न्यायाधीश ने शराबबंदी कानून को लेकर बिहार सरकार को जमकर फटकार लगाई है। इस बार कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि अदालत में हुए एक सुनवाई के दौरान ही बिहार सरकार के फैसले को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

पटना हाईकोर्ट 14-15 जज सिर्फ शराबबंदी कानून की कर रहे हैं सुनवाई

दरअसल, नीतीश सरकार ने शराबबंदी कानून के तहत पकड़े गए आरोपियों की जमानत के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में कई अपील दायर की हैं। ऐसे ही कुछ मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए बिहार सरकार से कहा कि इन केसों ने अदालतों का दम घोंट रखा है और पटना हाईकोर्ट के तो 14-15 जज सिर्फ इन्हीं मामलों की सुनवाई करते हैं। इसकी वजह से और किसी मामले पर सुनवाई नहीं हो पा रही है।" इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार की तरफ से शराबबंदी मामलों में हुई जमानतों के खिलाफ दायर 40 अपीलों को एक साथ ठुकरा दिया।

कानून के कारण केस सूचीबद्ध होने में लग रहा एक साल का समय

चीफ जस्टिस ने भड़कते हुए कहा, "आप जानते हैं कि इस कानून (बिहार शराबबंदी कानून) ने पटना हाईकोर्ट के कामकाज को कितना प्रभावित किया है और वह अदालत अब किसी मामले को सूचीबद्ध करने में एक साल का समय ले रही है। बिहार की सभी अदालतें शराबबंदी मामलों पर ही सुनवाई से घिरी हैं।"

जमानत पर दिशा निर्देश तय करने की मांग खारिज

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन वी रमण के नेतृत्व वाली पीठ ने बिहार सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि आरोपियों से जब्त की गई शराब की मात्रा को ध्यान में रखते हुए कारण के साथ जमानत आदेश पारित करना सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।

बिहार सरकार की दलील पर जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता मनीष कुमार ने कहा कि शिकायत यह है कि उच्च न्यायालय ने कानून के गंभीर उल्लंघन में शामिल आरोपियों को बिना कारण बताए जमानत दे दी है, जबकि कानून में इसके तहत गंभीर अपराधों के लिए 10 साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

उन्होंने कहा कि कुछ आरोपी "400 से 500 लीटर शराब" ले जाते या बेचते पाए गए हैं और फिर भी उन्हें ‘यांत्रिक तरीके’ से जमानत दी गई है, जबकि वे चार-पांच महीने ही जेल में रहे हैं। कुमार ने कहा, "मेरी समस्या यह है कि शराब के मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा लगातार जेल में बिताई गई कुछ अवधि के आधार पर ही जमानत के आदेश पारित किए जा रहे हैं।"

कोर्ट ने कहा आपने कानून बनाया है, इसलिए जमानत न मिले

प्रधान न्यायाधीश ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा, "तो आपके हिसाब से हमें सिर्फ इसलिए जमानत नहीं देनी चाहिए, क्योंकि आपने कानून बना दिया है।" पीठ ने तब हत्या पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधान का हवाला दिया और कहा कि जमानत और कभी-कभी, इन मामलों में अदालतों द्वारा अग्रिम जमानत भी दी जाती है। 


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