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राहुल की संसद में वापसी से क्या देश की राजनीति का बदलेगा रंग,क्या भाजपा के लिए बनेंगे खतरे की घंटी,पढ़िए न्यूज 4 नेशन की इनसाइड स्टोरी

राहुल की संसद में वापसी से क्या देश की राजनीति का बदलेगा रंग,क्या भाजपा के लिए  बनेंगे खतरे की घंटी,पढ़िए न्यूज 4 नेशन की इनसाइड स्टोरी

लोकसभा सचिवालय से आदेश भी जारी होते हीं राहुल गांधी की सांसदी बहाल हो गयी है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मोदी सरनेम मानहानि केस में राहुल गांधी को मिली दो साल की सजा और दोष सिद्धि को रद्द कर दिया था. मोदी शब्द को लेकर राहुल गांधी के कोलार में दिए गए भाषण पर चार साल बाद सज़ा दी गई. बता दें राहुल गांधी केरल के वायनाड का प्रतिनिधित्व संसद में करते है.

लोकसभा की सदस्यता वापस होने के बाद  राहुल गांधी फिर केंद्रीय भूमिका में लौट गए हैं. अविश्वास प्रस्ताव से पहले राहुल गांधी संसद में वापस आ गए क्या ये उम्मीद करना बेमानी होगी कि वे आक्रामकता के साथ संसद में अपनी बातें रखेंगे क्योंकि राहुल मणिपुर का दौरा कर चुके हैं वहां की जमीनी स्थिति से वाकिफ हैं.राहुल गांधी 2004 से लोकसभा सांसद हैं. राहुल गांधी की सदस्यता तब बहाल हुई है, जब कांग्रेस की अगुआई में कई विपक्षी दलों ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है. अविश्वास प्रस्ताव पर इसी हफ़्ते लोकसभा में बहस होनी है. ऐसे में राहुल गांधी भी इस बहस में हिस्सा ले सकेंगे.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहा है कि भाजपा ने ही राहुल गांधी को देश का हीरो बना दिया है. पहले उनको पप्पू पप्पू कह कर मजाक उड़ाने वाली भाजपा उन्हें हलके में नहीं ले सकती. भाजपा पहले कहती थी कि  कांग्रेस का नेतृत्व राहुल करेंगे तो फिर जीवन भर भारतीय जनता पार्टी जीतेगी. राहुल गांधी ने भाजपा के प्रश्नों का उत्तर अपनी भारत यात्रा से दे दिया.भारत यात्रा से कहीं न कहीं ये संदेश गया कि राहुल मेहनत करते हैं और गंभीर राजनीति करना चाहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की दो साल की सज़ा पर रोक लगाई तो भाजपा के तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई .कारण क्या है ? राहुल गांधी को भाजपा पहले गंभीरता से नहीं लेती थी, उन्हें 'पप्पू'  कहा जा रहा था . तो सवाल उठना लाजिम है कि क्या राहुल गांधी को लेकर भारतीय जनता पार्टी की अतिसक्रियता ही अब उस पर भारी पड़ गई  है? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जिस तरह से राहुल गांधी की सदस्यता गई उससे ज़मीनी स्तर पर संदेश यहीं गया कि संसद तक से राहुल को  निकाल दिया. तो कहीं न कहीं यह अतिसक्रियता के कारण भाजपा अपने हीं जाल में फंस गई.

 सबसे बड़ी बात कि 2024 में लोक सभा का चुनाव है .राहुल गांधी क्या भाजपा की राह के रोड़े नहीं बनेगे,संदेह है,क्योकि भाजपा लगातार राहुल गांधी को कम कर आंकने का प्रयास करती रही है. दो राज्यों के चुनाव परिणाम से लगता है कि उनकी  स्वीकार्यता बढ़ रही है.

 देश में इस साल कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव है. राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़ने ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच एक समझौता करवा दिया है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ हैं, वहां स्थानीय मुद्दे पर हीं चुनाव की उम्मीद है. विधानसभा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया तो इसके जो भी नतीजे आएंगे उसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा. 

 पटना की बैठक में विपक्ष की बैठक हुई थी उसमें राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने यह स्पष्ट कर दिया कि वो पूरी तरह सहयोग करेंगे. उसमें उन्होंने यह बता दिया कि ऐसा नहीं है कि मैं प्रधानमंत्री के पद का दावेदार होना चाहता हूं, ये चीज़ें नतीजे आने पर तय होती रहेंगी. उस दौरान राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को ही आगे रखा था. स्पष्ट है कि पीएम पद का उम्मीदवार कौन होगा इसको लेकर कांग्रस जल्दीबादी में नहीं.विपक्ष के एक होकर चुनाव लड़ने की स्थिति में भाजपा को नुसान उटाने का खतरा तो है हीं. साथ हीं राहुल को कम कर आंकने की गलती का खामियाजा भाजपा को उठाना भी पड़ सकता है.क्योकि इसी साल चार राज्यों में चुनाव है और इसकी जीत हार का प्रभाव लोक सभा के आम चुनाव पर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.  सुप्रीम कोर्ट से राहत के बाद राहुल ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा भी कि "चाहे जो कुछ भी हो, मेरा फ़र्ज़ वही रहेगा-आइडिया ऑफ़ इंडिया की हिफ़ाज़त." 


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