West Bengal Election : जब ‘ममता’ ने जेपी की कार पर चढ़कर किया डांस, 10 बार के सांसद सोमनाथ चटर्जी को दी शिकस्त, अब बंगाल में ढह गया किला

West Bengal Election : भले ही ममता दीदी के बंगाल का किला ढह गया है. लेकिन ममता अपने जुझारूपन के कारण पांच दशक तक राजनीति के केंद्र में रही.......पढ़िए आगे

West Bengal Election : जब ‘ममता’ ने जेपी की कार पर चढ़कर किया
ढह गया बंगाल का किला - फोटो : SOCIAL MEDIA

N4N DESK : पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'दीदी' के नाम से मशहूर ममता बनर्जी भले ही मौजूदा चुनावी नतीजों में सत्ता से दूर होती दिख रही हों, लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी छवि आज भी एक अडिग और जुझारू योद्धा की बनी हुई है। 1970 के दशक से शुरू हुआ उनका सफर आज पांच दशकों के बाद भी उतना ही प्रभावशाली है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने वाली ममता बनर्जी की कहानी इरादों की मजबूती और संघर्ष की पराकाष्ठा है।

1975 का वह चर्चित विद्रोह: जब सुर्खियों में आईं ममता

ममता बनर्जी का राजनीतिक उदय किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 1975 में, जब देश की राजनीति में जय प्रकाश नारायण (जेपी) का कद इंदिरा गांधी के समकक्ष माना जाता था, तब कोलकाता की सड़कों पर एक युवा लड़की ने उनके काफिले को रोक दिया था। ममता बनर्जी ने जेपी की कार के बोनट पर चढ़कर विरोध प्रदर्शन किया, जिसने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। यह उनके बेबाक और निडर स्वभाव की पहली बड़ी झलक थी।

जादवपुर का वह उलटफेर: जब दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को दी मात

ममता के करियर का सबसे निर्णायक मोड़ 1984 के लोकसभा चुनाव में आया। उन्होंने माकपा (CPI-M) के कद्दावर नेता और 10 बार के सांसद सोमनाथ चटर्जी को उनके गढ़ जादवपुर में शिकस्त देकर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। उस समय वह देश की सबसे युवा सांसदों में से एक बनीं। इसी जीत ने यह साफ कर दिया था कि ममता बनर्जी केवल विरोध की राजनीति नहीं करतीं, बल्कि वे बड़े से बड़े किलों को ढहाने की क्षमता भी रखती हैं।

जादवपुर से सयानी घोष: 'दीदी' के अक्स की नई पहचान

आज वही जादवपुर सीट एक बार फिर चर्चा में है, जहाँ से तृणमूल कांग्रेस (TMC) की युवा नेता सयानी घोष सांसद हैं। सयानी न केवल तृणमूल की स्टार प्रचारक रही हैं, बल्कि बंगाल के हालिया चुनावों में उनकी सादगी—सूती साड़ी, हवाई चप्पल और बेबाक भाषण शैली—ने लोगों को ममता बनर्जी के शुरुआती दिनों की याद दिला दी। सयानी ने 'दीदी' की उसी राजनीतिक विरासत और लड़ाकू तेवर को नई पीढ़ी के बीच बखूबी आगे बढ़ाया है।

बदलते हालात में भी 'अपरिहार्य' बनी हुई हैं ममता

चाहे वह 1998 में तृणमूल कांग्रेस का गठन हो या 2011 में 34 साल के वामपंथी शासन का अंत, ममता बनर्जी ने हमेशा अपनी शर्तों पर राजनीति की है। भले ही 2026 के विधानसभा चुनावों के रुझान राज्य में बड़े बदलाव (भाजपा की बढ़त) की ओर इशारा कर रहे हों, लेकिन ममता बनर्जी का नाम बंगाल के इतिहास में उस नेता के रूप में दर्ज रहेगा जिसने जमीन से जुड़कर सत्ता के गलियारों तक का सफर अपनी सादगी और जिद्द के दम पर तय किया। अब राष्ट्रहित और विकास के नए दावों के बीच उनकी अगली भूमिका पर पूरे देश की नजर है।