बिहार में मानसून की बेरुखी से खेती पर संकट, अगस्त तक 41% कम बारिश; धान की फसल बचाना चुनौती
अगस्त के तीसरे सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में बिहार में सामान्य तौर पर करीब 690.9 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, जबकि वास्तविक बारिश करीब 410.7 मिमी रही। इस तरह राज्य करीब 41 फीसदी बारिश की कमी से गुजर रहा था।
Bihar Monsoon Deficit : देश में इस साल मानसून की बारिश भले ही औसतन 13 फीसदी कम रही हो, लेकिन असली चिंता बिहार जैसे राज्य में बारिश के असमान स्थिति को लेकर है। इसका सबसे बड़ा असर बिहार पर दिखाई दे रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 4 जून से अगस्त के तीसरे सप्ताह तक देश में 537.6 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 619 मिमी होनी चाहिए थी। इस दौरान बिहार में बारिश सामान्य से करीब 40 फीसदी कम रही। यानी राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा बारिश की कमी बिहार को झेलनी पड़ी है।
बिहार में मानसून की शुरुआत के बाद जून और जुलाई में बारिश की कमी ने स्थिति को गंभीर बनाया। अगस्त में कुछ दौर में अच्छी बारिश जरूर हुई, लेकिन इससे शुरुआती कमी पूरी तरह दूर नहीं हो सकी। अगस्त के तीसरे सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में बिहार में सामान्य तौर पर करीब 690.9 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, जबकि वास्तविक बारिश करीब 410.7 मिमी रही। इस तरह राज्य करीब 41 फीसदी बारिश की कमी से गुजर रहा था।
खरीफ खेती पर असर
इस कमी का सीधा असर खरीफ खेती पर पड़ा है। बिहार में खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर है और धान इसकी सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसलों में शामिल है। बारिश समय पर नहीं होने से कई इलाकों में धान की रोपनी में देरी हुई और किसानों को खेतों में पानी पहुंचाने के लिए वैकल्पिक सिंचाई पर निर्भर होना पड़ा।
जुलाई के अंत तक स्थिति कई जिलों में बेहद खराब थी। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 31 जुलाई तक राज्य में धान की कुल रोपनी करीब 70 फीसदी ही हो पाई थी। दक्षिण और मध्य बिहार के कई जिलों में स्थिति और चिंताजनक थी। जमुई में लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 11 फीसदी, गया में 25 फीसदी, शेखपुरा में 31 फीसदी और बांका में 34 फीसदी धान की रोपनी हो सकी थी। इसके उलट उत्तर बिहार और सीमांचल के कई जिलों में रोपनी 66 से 100 फीसदी तक पहुंच चुकी थी।
बाद में अगस्त की बारिश से हालात में कुछ सुधार हुआ। 8 अगस्त तक कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में धान की रोपनी 37.914 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 32.568 लाख हेक्टेयर यानी करीब 85 फीसदी तक पहुंच गई थी। इसी अवधि में मक्के की बुआई भी अपने लक्ष्य के 94 फीसदी तक पहुंच गई।
धान की रोपनी करीब 97 फीसदी
हालांकि, बारिश की कमी का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है। 27 अगस्त तक बिहार में धान की रोपनी करीब 97 फीसदी लक्ष्य तक पहुंच चुकी थी, लेकिन कई जिलों में सामान्य से लगभग 42 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। कृषि विभाग ने कम बारिश से फसल को बचाने के लिए किसानों के लिए डीजल अनुदान की व्यवस्था भी शुरू की है।
गया जैसे जिलों में बारिश की कमी का असर और ज्यादा गंभीर रहा। वहां करीब 54 फीसदी बारिश की कमी के बीच धान की रोपनी एक समय लक्ष्य के सिर्फ 37 फीसदी तक पहुंच पाई थी। कृषि विभाग ने ऐसे क्षेत्रों में कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने की तैयारी की थी।
बिहार के लिए बड़ी चुनौती
बिहार के लिए अब सितंबर की बारिश बेहद महत्वपूर्ण होगी। धान की फसल खेतों में खड़ी है और पर्याप्त नमी की जरूरत बनी हुई है। ऐसे में मानसून के अंतिम चरण में अगर बारिश सामान्य से कम रहती है, तो किसानों की सिंचाई लागत बढ़ने के साथ-साथ धान की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि बिहार में इस साल का मानसून सिर्फ बारिश का आंकड़ा नहीं, बल्कि खेती और किसानों की आय के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।