बिहार में मजबूरी की तस्वीर: कंधे पर बेटे को बैठाकर उफनती नदी पार करा रहा बेबस पिता, देखें वायरल वीडियो

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो लोगों को अंदर से भावुक कर रहा है। वीडियो में एक पिता अपनी बेटे को कंधे पर बैठाकर तेज बहाव वाली नदी पार कर रहा है, ताकि वह स्कूल पहुंच सके। नदी का बहाव इतना तेज है कि एक छोटी-सी चूक दोनों की जान पर भारी पड़ सकती

नेपाल के तराई क्षेत्रों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश का असर अब बिहार के पश्चिमी चंपारण में साफ दिखने लगा है। गंडक, मसान, हरहा, कपन और भलुई जैसी तमाम पहाड़ी नदियां इस वक्त पूरे उफान पर हैं। मानसून की शुरुआत होते ही रामनगर प्रखंड का सीमावर्ती दोन क्षेत्र एक बार फिर प्रशासनिक मुख्यधारा से पूरी तरह कटने की कगार पर पहुंच गया है, जिससे स्थानीय निवासियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।


जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने को मजबूर बच्चे

इसी विकट परिस्थिति के बीच सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक करने वाला वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक बेबस पिता अपने मासूम बेटे को कंधे पर बैठाकर उफनती हुई तेज बहाव वाली नदी को पार करा रहा है, ताकि बच्चे की स्कूल की पढ़ाई न छूटे। नदी की लहरें इतनी खतरनाक हैं कि जरा सी चूक दोनों की जान ले सकती थी, लेकिन शिक्षा के प्रति जज्बे और मजबूरी के आगे पिता ने अपनी जान की बाजी लगा दी।


गंडक बराज से छूटा पानी, प्रशासन ने जारी किया अलर्ट

पहाड़ी इलाकों में जारी भारी बारिश के दबाव को देखते हुए सोमवार को वाल्मीकिनगर गंडक बराज से करीब 2 लाख क्यूसेक पानी नदी में छोड़ा गया। इसके तुरंत बाद गंडक सहित अन्य सहायक नदियों का जलस्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने निचले इलाकों में हाई अलर्ट जारी किया है और लोगों को नदी के तटवर्ती क्षेत्रों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी है।


हर साल की वही त्रासदी और विकास के अधूरे दावे

दोन क्षेत्र के करीब 22 गांवों के लिए यह सालाना जल-त्रासदी कोई नई बात नहीं है। बुनियादी बुनियादी ढांचे और पुलों के अभाव में हर साल यहां के लोग राशन, इलाज और पढ़ाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए उफनती नदियों को पार करने को मजबूर होते हैं। वायरल हो रहा यह वीडियो न सिर्फ एक पिता के संघर्ष को दिखाता है, बल्कि उन तमाम अधूरे विकास कार्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है जो सालों से सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।

रिपोर्ट - धीरज पराशर