'न्याय मित्र' के साथ ही 'अन्याय': 10 महीने काम के बाद रिया को क्यों निकाला? 'स्वतंत्रता सेनानी' कोटे के नाम पर क्या सिस्टम खेल रहा है खेल?

कटिहार की न्याय मित्र रिया जयसवाल के साथ हुआ बड़ा अन्याय। 10 महीने काम के बाद स्वतंत्रता सेनानी कोटे का हवाला देकर पद से हटाया। जानिए क्या है पूरा मामला और डीएम आशुतोष द्विवेदी की जांच में क्या निकलेगा?

Katihar -  बिहार के कटिहार जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जो सरकारी चयन प्रक्रिया और प्रशासनिक पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा रहा है। गरभैली पंचायत में पदस्थापित न्याय मित्ररिया जयसवालको 10 महीने तक सेवा देने के बाद अचानक 'दूध में से मक्खी' की तरह निकाल फेंका गया है। 18 मार्च 2026 को जब रिया ट्रेनिंग के लिए जा रही थीं, तब उन्हें रोककर कह दिया गया—"अब आपकी जरूरत नहीं है"

10 महीने बाद जागी प्रशासन की नींद या किसी 'खास' को देने की है तैयारी?

रिया जयसवाल की नियुक्ति 6 जून 2025 को सभी विधिवत प्रक्रियाओं और काउंसलिंग के बाद हुई थी। सवाल यह है कि अगर चयन में कोई कमी थी, तो प्रशासन को इसे समझने में 10 महीनेक्यों लग गए? क्या 10 महीने तक रिया से काम लेना शोषण नहीं है? अब अचानक उनकी जगह दूसरे अभ्यर्थी का चयन कर लेना किसी बड़े 'पर्दे के पीछे के खेल' की ओर इशारा कर रहा है।

स्वतंत्रता सेनानी के सम्मान की आड़ में 'सियासत'?

प्रशासन ने रिया को हटाने के पीछे "स्वतंत्रता सेनानी के परिजनों की सीट"का हवाला दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि:

  1. अगर सीट आरक्षित थी, तो नियुक्ति के समय इसकी जांच क्यों नहीं की गई?
  2. क्या स्वतंत्रता सेनानियों के नाम का इस्तेमाल किसी अपात्र को उपकृत करने के लिए किया जा रहा है?
  3. क्या 10 महीने की मेहनत और उम्मीदों का कोई मूल्य नहीं है?

क्या कहती हैं पीड़ित रिया और प्रशासन?

वीडियो बाइट में अपना दर्द बयां करते हुएन्याय मित्र रिया जयसवालने कहा—"मुझसे 10 महीने काम लिया गया और अब अचानक बिना किसी ठोस नोटिस के मुझे हटाकर दूसरे को रख लिया गया। यह मेरे भविष्य के साथ खिलवाड़ है।"

वहीं, कटिहार डीएम आशुतोष द्विवेदीने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा है—"मामला संज्ञान में आया है। फाइलें मंगवाई गई हैं और चयन प्रक्रिया की बारीकी से जांच की जा रही है। अगर कहीं भी नियमों की अनदेखी हुई है, तो दोषियों पर कार्रवाई होगी।"

सिस्टम की साख पर लगा बड़ा बट्टा

यह मामला अब सिर्फ रिया का नहीं रहा, बल्कि उन तमाम अभ्यर्थियों का है जो सिस्टम पर भरोसा कर नौकरी पाते हैं। अगर 10 महीने बाद किसी को भी बिना वजह हटाया जा सकता है, तो फिर चयन प्रक्रिया की पवित्रता क्या रह गई? फिलहाल, सबकी नजरें डीएम की जांच पर हैं। क्या रिया को न्याय मिलेगा या सिस्टम अपनी 'गलती' के नाम पर एक और बलि चढ़ा देगा?

रिपोर्ट - श्याम कुमार