Bihar News: खाकी की मनमानी पर कोर्ट का करारा प्रहार, गलत अनुसंधान पर DSP समेत 3 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का फरमान

Bihar News: पुलिसिया कार्रवाई और अनुसंधान की कार्यशैली पर अदालत ने कड़ा प्रहार किया है।....

Bihar News: बिहार के नालंदा में पुलिसिया कार्रवाई और अनुसंधान की कार्यशैली पर अदालत ने कड़ा प्रहार किया है। गलत तथ्यों के आधार पर गंभीर आपराधिक धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने, अनुसंधान करने और आरोप पत्र समर्पित करने के मामले में बिहारशरीफ कोर्ट ने राजगीर डीएसपी समेत तीन पुलिस पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है। अदालत ने डीएसपी को 15 दिन और सिलाव थानाध्यक्ष तथा अनुसंधान पदाधिकारी को एक-एक महीने के प्रशिक्षण में भेजने का निर्देश एसपी को दिया है। साथ ही संपूर्ण कार्रवाई की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने और आदेश की प्रति गृह सचिव तथा पुलिस महानिदेशक को भेजने का निर्देश दिया गया है।

कट्टा, जानलेवा हमले का आरोप और जेल में बंद आरोपी

पूरा मामला सिलाव थाना क्षेत्र के करियन्ना गांव से जुड़ा है। गांव निवासी पारस सिंह ने अविनाश कुमार समेत तीन अन्य लोगों पर जान मारने की नीयत से कट्टा तानने का आरोप लगाया था। सूचक ने कथित तौर पर अविनाश कुमार को देसी कट्टा के साथ पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। इस मामले में अविनाश कुमार 15 जून से जेल में बंद था। जमानत की आस में आरोपी की ओर से न्यायालय में आवेदन दाखिल किया गया, जिसके बाद मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई और अनुसंधान की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

थाने से लेकर पर्यवेक्षण तक सवालों के घेरे में पुलिसिया कार्रवाई

मामले में सिलाव थानाध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार ने सूचक के आवेदन पर जानलेवा हमले और आर्म्स एक्ट की गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके बाद पुलिस अवर निरीक्षक घनश्याम कुमार ने अनुसंधान किया, जबकि राजगीर डीएसपी ने मामले का पर्यवेक्षण किया। पुलिस पदाधिकारियों ने घटना को सही और सत्य मानते हुए न्यायालय में आरोप पत्र समर्पित कर दिया।

हालांकि, आरोपी के अधिवक्ता मदन प्रसाद सिंह ने पूरे घटनाक्रम को संदिग्ध बताते हुए जमानत की गुहार लगाई। सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति जताई और अविनाश कुमार को जमानत प्रदान कर दी।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: मनमानी या कानून की जानकारी का अभाव!

जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-11 मनीष कुमार ने अपने आदेश में कहा कि थानाध्यक्ष ने तथ्यों से परे जाकर मनमाने, लापरवाहीपूर्ण और अविवेकपूर्ण तरीके से प्राथमिकी दर्ज की। इसके बाद पर्यवेक्षण और अनुसंधान के बावजूद आरोप पत्र समर्पित किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस स्थिति से दो संभावनाएं उभरती हैं या तो अभियुक्त को फंसाने के लिए मनगढ़ंत कहानी के आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया, अथवा संबंधित पुलिस पदाधिकारियों को कानून की पर्याप्त जानकारी नहीं है और उनके प्रशिक्षण में कमी है।

न्यायालय ने दोनों ही स्थितियों को विधि के शासन के लिए घातक करार दिया। अदालत के मुताबिक, कानून का गलत इस्तेमाल होने से पुलिस और कानून लागू करने वाली संस्थाओं की साख धूमिल होती है। अब एसपी को संबंधित पदाधिकारियों के खिलाफ आदेश के अनुरूप कार्रवाई कर न्यायालय को इसकी जानकारी देनी होगी। यह आदेश पुलिसिया अनुसंधान में जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।

रिपोर्ट- राज पाण्डेय