2025 में महागठबंधन की हार के बाद बिहार में सियासी कसौटी, आपसी तकरार और 2026 में टूट या मजबूरी का साथ? पढ़िए इनसाइड स्टोरी
Bihar politics:साल 2025 महागठबंधन के लिए ऐसा अध्याय बन गया है, जिसे वह शायद ही याद रखना चाहे। चुनावी शिकस्त, घटता जनाधार और अंदरूनी कलह ने इस गठबंधन की सियासी बुनियाद को हिला कर रख दिया है।...
Bihar politics:साल 2025 महागठबंधन के लिए ऐसा अध्याय बन गया है, जिसे वह शायद ही याद रखना चाहे। चुनावी शिकस्त, घटता जनाधार और अंदरूनी कलह ने इस गठबंधन की सियासी बुनियाद को हिला कर रख दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने महागठबंधन को महज 35 सीटों पर समेट दिया, जबकि जनता ने एनडीए की झोली में 202 सीटें डालकर अपना फैसला सुना दिया। हार के साथ ही गठबंधन की अंदरूनी दरारें खुलकर सामने आ गईं।
चुनाव से पहले ही सीट बंटवारे को लेकर राजद और कांग्रेस के बीच खींचतान शुरू हो चुकी थी। नतीजे आने के बाद यह असंतोष खुली बयानबाजी में बदल गया। कांग्रेस नेताओं ने हार का ठीकरा राजद पर फोड़ा तो राजद ने कांग्रेस की कमजोर सांगठनिक स्थिति को जिम्मेदार ठहरा दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान का यह कहना कि “अब बिहार में महागठबंधन जैसी कोई चीज नहीं बची” सियासी हलकों में भूचाल ले आया। उनके मुताबिक, कांग्रेस को अब राजद के सहारे की जरूरत नहीं है और अकेले चलना ही बेहतर विकल्प है।
राजद ने भी पलटवार करने में देर नहीं लगाई। प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने साफ कहा कि बिहार में कांग्रेस की ताकत राजद से ही आती है और जो भी वोट मिले हैं, वे तेजस्वी यादव के काम और राजद कार्यकर्ताओं की मेहनत का नतीजा हैं। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने तो इस गठबंधन को जेल यात्रा के डर से बना गठबंधन बताते हुए इसके औचित्य पर ही सवाल खड़े कर दिए।
हालांकि सियासत की हकीकत इससे अलग भी है। बिहार में कांग्रेस और राजद दोनों जानते हैं कि वे अकेले एनडीए के रथ को रोकने की हैसियत नहीं रखते। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राजद की जरूरत पड़ती है, तो लोकसभा चुनाव में राजद कांग्रेस के बिना अधूरा महसूस करता है। मुस्लिम, यादव और सवर्ण दलित समीकरण का यह मजबूरी भरा मेल ही महागठबंधन की असली वजह रहा है। वाम दल, वीआईपी और अन्य सहयोगियों के पास भी राजद से अलग कोई मजबूत विकल्प नहीं है।
आंकड़े खुद कहानी बयां करते हैं। 2010 में अलग-अलग लड़ने का नतीजा कांग्रेस के लिए महज चार सीटें रहा। 2015 और 2020 में साथ आने पर दोनों को फायदा मिला। लेकिन 2025 में संगठन की कमजोरी, आपसी अविश्वास और रणनीतिक विफलता ने गठबंधन को रसातल में पहुंचा दिया।
साफ है कि 2026 महागठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा का साल होगा। बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर अगर राजद और कांग्रेस आत्ममंथन, संगठनात्मक सुधार और साझा रणनीति पर नहीं पहुंचे, तो गठबंधन का भविष्य संदेह के घेरे में रहेगा। लेकिन सियासत की मजबूरी यही है कि चाहे तल्खी कितनी भी हो, चुनाव के वक्त ये दल फिर एक मंच पर नजर आ सकते हैं। सवाल सिर्फ इतना है क्या यह साथ मजबूरी का होगा या नए भरोसे का?