Bihar Politics: अनंत सिंह के निष्कासन से मोकामा की सियासत में नया मोड़, भूमिहार वोट बैंक पर किसका होगा कब्जा? पढ़िए इनसाइड स्टोरी
Bihar Politics: मोकामा की सियासत में जनता दल यूनाइटेड से अनंत सिंह के निष्कासन के बाद सियासी सरगर्मी तेज हो गई है।...
Bihar Politics: मोकामा की सियासत में जनता दल यूनाइटेड से अनंत सिंह के निष्कासन के बाद सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। इस फैसले ने न केवल जदयू के स्थानीय जनाधार, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के जातीय समीकरणों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी से बाहर होने के बावजूद अनंत सिंह का व्यक्तिगत जनाधार बरकरार रहेगा और क्या इसका खामियाजा जदयू तथा एनडीए को भुगतना पड़ सकता है?
जातीय समीकरण में भूमिहारों की निर्णायक भूमिका
बिहार सरकार के जाति आधारित सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य की आबादी में भूमिहार समुदाय की हिस्सेदारी 2.86 प्रतिशत है। हालांकि, मोकामा की सियासत में इस बिरादरी का रसूख राज्य के औसत से कहीं अधिक है। स्थानीय चुनावी आकलनों में भूमिहार मतदाताओं की हिस्सेदारी 35 से 38 प्रतिशत तक बताई जाती है। इसके अलावा यादव, धनुक, कुर्मी-कोइरी, दलित और मुस्लिम मतदाता भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं।
मोकामा विधानसभा क्षेत्र की जनवरी 2024 की मतदाता सूची में करीब 2.9 लाख मतदाता दर्ज थे। स्थानीय आकलनों के मुताबिक, भूमिहार मतदाताओं की संख्या लगभग 55 से 65 हजार मानी जाती है। वर्ष 1952 से इस सीट पर भूमिहार समुदाय के उम्मीदवारों की जीत का सिलसिला भी इस बिरादरी के सियासी दबदबे को रेखांकित करता है। यहां चुनावी जंग केवल पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं, बल्कि जातीय गोलबंदी, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और बाहुबली छवि के इर्द-गिर्द भी लड़ी जाती रही है।
अनंत सिंह का सियासी सफर इस बात की नजीर है कि मोकामा में उनका जनाधार किसी एक पार्टी का मोहताज नहीं रहा। वर्ष 2015 में जदयू का टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 54,005 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। वर्ष 2020 में राजद के टिकट पर उन्हें 78,721 वोट मिले। वर्ष 2022 में उनकी सदस्यता समाप्त होने के बाद उपचुनाव में उनकी पत्नी नीलम देवी ने राजद के टिकट पर 79,744 वोट हासिल कर जीत दर्ज की।
वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने जदयू के टिकट पर 91,416 वोट हासिल किए और 28,206 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। इन नतीजों से जाहिर होता है कि उनका वोट बैंक किसी एक चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है। भूमिहार मतदाताओं के साथ टाल-दियारा इलाके के अति पिछड़े वर्गों, मल्लाहों और यादव समुदाय के एक हिस्से का समर्थन भी उनकी ताकत माना जाता है।
जदयू के सामने साख की चुनौती
अनंत सिंह के निष्कासन से जदयू के सामने मोकामा में अपना सियासी वजूद कायम रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। पार्टी का पारंपरिक कैडर वोट और भाजपा के प्रति प्रतिबद्ध मतदाताओं का समर्थन एनडीए के लिए अहम रहेगा, लेकिन अनंत सिंह के व्यक्तिगत समर्थकों की नाराजगी चुनावी गणित बिगाड़ सकती है।ये सवाल है। हालाकि ललन सिंह, विजय सिन्हा, नीरज कुमार भी भूमिहार विरादरी से हीं आते हैं। कई राजनीतिक पंडितो का मानना है कि अनंत के निष्कासन से कोई खास असर नहीं पड़ेगा तो कई राजनीतिक जानकारों के अनुसार इसका प्रभाव मौकामा के साथ आसपास की राजनीति पर पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम को भूमिहार समुदाय की सामूहिक नाराजगी मान लेना भी जल्दबाजी होगी। समुदाय के सभी मतदाता अनंत सिंह के समर्थक नहीं हैं और न ही भाजपा-जदयू का हर सवर्ण मतदाता उनके साथ जाएगा। मतदाताओं का रुख उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों, गठबंधन और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
क्या एनडीए के वोट बैंक में लगेगी सेंध?
मोकामा के अलावा बाढ़, पंडारक, घोसवरी, लखीसराय और मुंगेर के कुछ इलाकों में भी भूमिहार मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। यदि अनंत सिंह निर्दलीय या किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो इन क्षेत्रों में एनडीए के सामने वोटों के बिखराव का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर उनके अगले राजनीतिक कदम और स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा।
जदयू के लिए यह फैसला तत्काल सियासी नुकसान की आशंका पैदा करता है, जबकि अनंत सिंह के लिए पार्टी से बाहर अपनी लोकप्रियता साबित करने की चुनौती है। फिलहाल इतना तय है कि मोकामा की सियासत में मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि संगठनात्मक ताकत और व्यक्तिगत जनाधार के बीच भी होगा। आने वाले दिनों में यही टकराव एनडीए के जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
ब्यूरो रिपोर्ट