Lalu Yadav:महुआबाग में नौकरी के बदले जमीन का सौदा, भोला यादव की भूमिका आई सामने! CBI तक कैसे पहुँची राजद सुप्रीमो के हनुमान की जानकारी? भूमि के खरीद फरोख्त का पढ़िए पूरा राज
Lalu Yadav: जमीन के बदले नौकरी मामले में A-7 यानी भोला यादव का नाम सामने आते ही सियासी हलकों में खलबली मच गई है। ...
Lalu Yadav: राजनीति की गलियों में अक्सर वफादारी को हनुमानगीरी कहा जाता है, लेकिन जब वही वफादारी कानून की कसौटी पर आए, तो सवाल नीयत और नियत दोनों पर उठते हैं। जमीन के बदले नौकरी मामले में A-7 यानी भोला यादव का नाम सामने आते ही सियासी हलकों में खलबली मच गई है। भोला यादव, जिन्हें लालू प्रसाद यादव का हनुमान कहा जाता है, उस दौर में रेल मंत्री लालू के विशेष कार्य अधिकारी थे। सीबीआई की चार्जशीट में उन्हें सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि पूरे कथित क्विड प्रो क्वो नेटवर्क की अहम कड़ी बताया गया है।
चार्जशीट के मुताबिक, जमीन लेने और रेलवे में नौकरी दिलाने की जमीनी सौदेबाजी भोला यादव के जरिए होती थी। पटना से सटे महुआबाग में जाकर जमीन देखना, गांव के लोगों से मिलना, भरोसेमंद लोगों के जरिए नौकरी का ‘ऑफर’ देना और फिर सब कुछ एक्सेल शीट में दर्ज कराना यह पूरा तंत्र भोला यादव के इर्द-गिर्द घूमता था। सीबीआई का दावा है कि उसके पास इस सिलसिले में गवाह भी हैं और इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी।
नागेंद्र राय का बयान इस मामले में खासा अहम माना जा रहा है। उनके अनुसार, किशुन देव राय जैसे लोग गांव-गांव घूमकर जमीन ट्रांसफर के लिए लोगों से संपर्क करते थे, जबकि भोला यादव खुद गांव का दौरा कर यह संदेश देते थे कि जमीन लालू प्रसाद यादव या उनके परिवार के नाम कर दी जाए। नागेंद्र राय का कहना है कि भोला यादव के आने से पहले ही गांव में खबर पहुंच जाती थी और उनका मकसद सिर्फ यही होता था कि सौदा बिना सवाल-जवाब के पूरा हो जाए। बाद में वही जमीनें घूम-फिरकर लालू परिवार के पास पहुंच गईं और जमीन देने वालों या उनके रिश्तेदारों को रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई।
सीबीआई ने एक और गवाह नेमत अली के बयान का भी जिक्र किया है, जो लालू के कैंप कार्यालय में स्टेनोग्राफर थे। उनके मुताबिक, भोला यादव उसी कैंप कार्यालय से काम करते थे और कंप्यूटर पर उम्मीदवारों के नाम, पिता का नाम और पता टाइप करवाते थे। यही नाम बाद में सब्स्टीट्यूट नियुक्तियों की एक्सेल शीट में पाए गए। हार्ड डिस्क की बरामदगी ने सीबीआई के शक को और पुख्ता कर दिया है।
चार्जशीट का लहजा साफ है कि भोला यादव पर IPC की धारा 420, 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत आरोप तय करने के पर्याप्त आधार हैं। जांच एजेंसी का मानना है कि भोला यादव अपने मंत्री की “बेईमान इच्छाओं” को अमली जामा पहनाने का औजार बने। अब सवाल यह है कि क्या भोला यादव सिर्फ आदेशों का पालन कर रहे थे, या फिर सत्ता के गलियारों में सौदेबाजी के सबसे बड़े किरदार थे? जवाब अदालत के फैसले में छिपा है, लेकिन फिलहाल राजनीति की फिजा में शक, सियासत और साजिश की बू साफ महसूस की जा सकती है।