Bihar News: महंगाई ने तोड़ी जनता की कमर, खरीदारी घटी, बाजार सूना, बिहार सरकार की कमाई में 500 करोड़ से ज्यादा की कमी, पढ़िए सरकार क्यों है चिंतित

Bihar News: बढ़ती महंगाई ने लोगों को अपने खर्चों में कटौती करने के लिए मजबूर कर दिया है। ....

बिहार की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल!- फोटो : Hiresh Kumar

Bihar News: पश्चिम एशिया में छिड़े ईरान-इजरायल संघर्ष और उसमें अमेरिका की सक्रिय भूमिका का असर अब बिहार की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण कच्चे तेल और ऊर्जा बाजार में आई उथल-पुथल ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब और बाजार की रौनक पर पड़ा है। बढ़ती महंगाई और स्थिर आमदनी के बीच बिहार में उपभोग घट रहा है, जिससे राज्य का जीएसटी संग्रह भी दबाव में आ गया है। आंकड़े इस चिंता को और गहरा करते हैं। अप्रैल 2026 में राज्य को अप्रैल 2025 की तुलना में करीब 285 करोड़ रुपये कम जीएसटी प्राप्त हुआ, जबकि मई 2026 में भी मई 2025 के मुकाबले लगभग 246 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। यह गिरावट केवल सरकारी राजस्व का मामला नहीं है, बल्कि यह बाजार की सुस्ती और लोगों की घटती क्रय शक्ति की ओर भी इशारा करती है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बढ़ती महंगाई ने लोगों को अपने खर्चों में कटौती करने के लिए मजबूर कर दिया है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ी, जिसका असर लगभग हर वस्तु और सेवा की कीमत पर पड़ा। नतीजा यह हुआ कि लोग अब गैर-जरूरी खरीदारी से बच रहे हैं। मॉल, बाजार, रेस्टोरेंट और अन्य उपभोक्ता सेवाओं में पहले जैसी चहल-पहल नहीं दिख रही है।

अर्थशास्त्री प्रो. रामानंद पाण्डेय के अनुसार, जब आमदनी स्थिर रहे और वस्तुएं लगातार महंगी होती जाएं, तो बाजार में लेन-देन स्वाभाविक रूप से धीमा पड़ जाता है। खुदरा महंगाई दर भले ही नियंत्रित दिखाई दे रही हो, लेकिन थोक महंगाई में बढ़ोतरी और परिवहन लागत ने उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसका असर सीधे घरेलू खपत पर पड़ रहा है। हालांकि जीएसटी संग्रह में कमी की एक वजह कर ढांचे में बदलाव भी है। सितंबर 2025 में जीएसटी स्लैब में हुए संशोधन के तहत कई वस्तुओं को 28 प्रतिशत से 18 प्रतिशत और 18 प्रतिशत से 5 प्रतिशत अथवा शून्य कर श्रेणी में लाया गया। इससे उपभोक्ताओं को राहत तो मिली, लेकिन बिहार जैसे उपभोग आधारित राज्यों के राजस्व पर दबाव बढ़ गया।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी चुनौतियों से घिरी हुई है। पिछले वर्ष सितंबर-अक्टूबर की भारी बारिश और उसके बाद मार्च-अप्रैल में बेमौसम वर्षा ने किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाया। गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों की पैदावार प्रभावित होने से किसानों की आय में गिरावट आई है। इसका असर ग्रामीण बाजारों की खरीद क्षमता पर भी दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक और आर्थिक हलकों में अब यह चर्चा तेज है कि यदि महंगाई, कमजोर मांग और कृषि संकट का यह दौर लंबा खिंचता है तो बिहार की अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाजार में मांग बढ़ाने, ग्रामीण आय को मजबूत करने और उपभोक्ता विश्वास को फिर से बहाल करने की होगी। अर्थशास्त्री प्रो. रामानंद पाण्डेय के अनुसार जीएसटी संग्रह में गिरावट ने यह संकेत दे दिया है कि आर्थिक मोर्चे पर हालात सामान्य नहीं हैं और आने वाले महीनों में सरकार को राहतकारी कदमों पर गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है।