Bihar Government: 34 मंत्री, 170 गाड़ियां और अनलिमिटेड खर्च! बिहार में वीआईपी काफिलों का बड़ा खुलासा, बिहार सरकार के काफिले का पढ़िए पूरा हिसाब
Bihar Government: बिहार में सरकारी फिजूलखर्ची पर लगाम कसने की तैयारी शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद पटना शहर के भीतर इलेक्ट्रिक कार से सफर शुरू कर दिया है और मंत्रियों से अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या कम करने की अपील की है।...
Bihar Government:प्रधानमंत्री के सरकारी फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने की अपील का असर अब बिहार की सियासत और नौकरशाही में साफ दिखाई देने लगा है। सत्ता के गलियारों में अब सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि अमल की आहट भी सुनाई दे रही है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या कम करने का फैसला लेकर एक बड़ा सियासी और प्रशासनिक पैगाम देने की कोशिश की है। पटना की सड़कों पर मुख्यमंत्री का इलेक्ट्रिक कार में सफर करना सिर्फ एक प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र को मितव्ययिता का सबक देने की पहल माना जा रहा है।
दरअसल, देशभर में बढ़ते ईंधन खर्च, और सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ के बीच केंद्र सरकार लगातार सादगी और संसाधनों के संयमित इस्तेमाल पर जोर दे रही है। इसी कड़ी में बिहार सरकार भी अब अपने मंत्रियों, अफसरों और सरकारी मशीनरी के खर्च पर लगाम कसने की तैयारी में दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में मंत्रियों को मिलने वाले अनलिमिटेड पेट्रोल-डीजल की सुविधा पर राशनिंग लागू की जा सकती है। यानी अब तेल खर्च की भी एक तय सीमा होगी।बिहार में फिलहाल सचिव स्तर के अधिकारियों को हर महीने 200 से 300 लीटर तक पेट्रोल या डीजल मिलता है, जबकि बीपीएससी रैंक के अधिकारियों को 150 से 200 लीटर तक ईंधन की सुविधा दी जाती है। अब सरकार इस कोटे को आधा करने या सीमित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह राज्य की नौकरशाही के लिए बड़ा बदलाव होगा।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जनता से भी अपील की है कि लोग अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें। उन्होंने निजी और सरकारी दफ्तरों में जरूरत के मुताबिक वर्क फ्रॉम होम लागू करने की बात कही है। साथ ही मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों से भी अपने काफिले छोटे करने की नसीहत दी है। इसका असर अब सत्ता के भीतर भी दिखने लगा है। कई मंत्री कार पूलिंग कर रहे हैं, जबकि कुछ अधिकारी सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने लगे हैं। यह फैसला सरकारी खजाने के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है। बिहार में एक मंत्री के काफिले में औसतन पांच गाड़ियां चलती हैं। इनमें ज्यादातर डीजल से चलने वाली इनोवा, स्कॉर्पियो या इसी तरह की एसयूवी शामिल होती हैं। यदि एक गाड़ी औसतन 10 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती है, तो 150 किलोमीटर की यात्रा में एक गाड़ी करीब 15 लीटर डीजल खर्च करेगी। यानी पांच गाड़ियों का काफिला एक दिन में लगभग 75 लीटर डीजल फूंक देता है।
अगर मुख्यमंत्री को छोड़कर राज्य के 34 मंत्रियों का हिसाब लगाया जाए तो प्रतिदिन करीब 2550 लीटर डीजल खर्च होता है। महीने के हिसाब से यह आंकड़ा 76,500 लीटर तक पहुंच जाता है। वर्तमान में डीजल की कीमत लगभग 94 रुपए प्रति लीटर मानी जाए तो बिहार सरकार हर महीने सिर्फ मंत्रियों के काफिलों पर करीब 71.91 लाख रुपए खर्च कर रही है।ऐसे में यदि मंत्रियों के काफिलों की गाड़ियों की संख्या आधी कर दी जाए तो हर महीने लगभग 36 लाख रुपए की बचत संभव है। यह रकम सालाना करोड़ों में पहुंच सकती है। मुख्यमंत्री के काफिले में फिलहाल 21 गाड़ियां चलती हैं, जिनका खर्च अलग से है। हालांकि मुख्यमंत्री ने खुद अपने कारकेड को आधा करने का फैसला लेकर यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में सरकार सख्त कदम उठा सकती है।
सियासी जानकार मानते हैं कि यह फैसला सिर्फ आर्थिक बचत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे जनता के बीच एक मजबूत संदेश देने की रणनीति भी है। आम आदमी महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है। ऐसे में अगर मंत्री और अफसर खुद सादगी अपनाते हैं तो सरकार की छवि जनता के बीच ज्यादा जिम्मेदार और संवेदनशील बन सकती है।हालांकि विपक्ष इस पूरे मुद्दे पर सरकार की नीयत पर भी सवाल उठा सकता है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या यह कदम वास्तव में खर्च कम करने के लिए है या फिर जनता के बीच सादगी की नई राजनीतिक इमेज गढ़ने की कोशिश। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में अब ‘छोटा काफिला, बड़ा संदेश’ नया सियासी नैरेटिव बनता दिखाई दे रहा है।