सावधान! बिहार में कुत्तों का तांडव: हर दिन 776 लोग हो रहे शिकार, पटना बना हॉटस्पॉट
बिहार में आवारा कुत्तों का आतंक अब एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल गया है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की रिपोर्ट ने इस समस्या की भयावहता को आंकड़ों के जरिये स्पष्ट किया है.
बिहार विधानसभा में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, राज्य में 'डॉग बाइट' (कुत्ते का काटना) अब सबसे व्यापक स्वास्थ्य समस्या बन गई है। रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में कुल 2,83,274 लोग कुत्तों का शिकार बने। यह संख्या पिछले वर्ष (2,44,367) की तुलना में लगभग 39 हजार अधिक है, जो राज्य में बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक और नगर निकायों की विफलता को दर्शाता है।
हर दिन 776 लोग हो रहे शिकार, पटना बना हॉटस्पॉट
आंकड़ों का विश्लेषण करें तो राज्य में औसतन हर दिन 776 लोग कुत्तों के हमले का शिकार हो रहे हैं। राजधानी पटना इस सूची में सबसे ऊपर है, जहाँ अकेले 29,280 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद पूर्वी चंपारण (24,452) और नालंदा (19,637) का नंबर आता है। पटना में बढ़ते मामले शहर के रिहायशी इलाकों में असुरक्षा का माहौल पैदा कर रहे हैं, जिससे आम जनता का सड़कों पर निकलना दूभर हो गया है।
बीमारियों की सूची में शीर्ष पर 'डॉग बाइट'
हैरानी की बात यह है कि कुत्तों का काटना अब सामान्य बीमारियों से भी आगे निकल गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि दूसरी सबसे व्यापक बीमारी 'एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन' (ARI) रही, जिसके 31,025 मामले मिले। तुलनात्मक रूप से देखें तो डॉग बाइट के मामले इससे नौ गुना ज्यादा हैं। यह आंकड़ा प्रशासन के लिए एक अलार्म की तरह है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर दबाव डाल रहा है।
रेबीज का खतरा और WHO की चेतावनी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, रेबीज एक बेहद घातक बीमारी है जो मुख्य रूप से संक्रमित कुत्तों के काटने से फैलती है। हालांकि समय पर टीकाकरण (Vaccination) से जान बचाई जा सकती है, लेकिन एक बार लक्षण दिखने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है। बिहार में सांप काटने की घटनाओं ने भी चिंता बढ़ाई है, जिससे 2024-25 में 138 मौतें दर्ज की गई हैं। यह राज्य में पशु-जनित खतरों की गंभीरता को रेखांकित करता है।
प्रभावित जिलों का विवरण और प्रशासनिक चुनौती
जहाँ पटना, चंपारण और गोपालगंज जैसे जिले कुत्तों के आतंक से त्रस्त हैं, वहीं कुछ जिलों में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है। रोहतास, सुपौल और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों में मामले 2,000 से कम रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि नसबंदी और टीकाकरण अभियानों की सुस्त रफ़्तार इस संकट का मुख्य कारण है। यदि समय रहते आवारा कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह संकट आने वाले समय में और भी विकराल रूप ले सकता है।