Nitish Kumar strategy: सीएम के मौन में छिपी महाचाल? नीतीश के कदमों से सियासत में सस्पेंस , राज्यसभा मतदान में दूरी के सत्ता-समीकरण का गूढ़ संकेत को समझिए
Nitish Kumar strategy: बिहार की राजनीति एक बार पुनः उस बिंदु पर खड़ी है, जहाँ प्रत्येक संकेत, प्रत्येक मौन और प्रत्येक कदम के भीतर एक संभावित राजनीतिक परिवर्तन का बीज निहित है।
Nitish Kumar strategy: पटना की राजनीतिक परिधि एक बार पुनः अनिश्चितताओं और कूटनीतिक संकेतों के जाल में उलझती प्रतीत हो रही है। नीतीश कुमार के हालिया आचरण ने यह जिज्ञासा उत्पन्न कर दी है कि क्या उनका राज्यसभा चुनाव से विमुख रहना एक साधारण प्रशासनिक प्राथमिकता है अथवा किसी व्यापक राजनीतिक पुनर्संयोजन का सूक्ष्म संकेत।
विधानसभा में मतदान की प्रक्रिया के दौरान जहाँ समस्त प्रमुख नेता अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, वहीं नीतीश कुमार का अनुपस्थित रहना और प्रशासनिक निरीक्षण में संलग्न रहना, सामान्य राजनीतिक व्यवहार से भिन्न परिघटना के रूप में उभरा। यह केवल भौतिक अनुपस्थिति नहीं, अपितु एक प्रतीकात्मक मौन भी था, जिसने सत्ता-समीकरणों के प्रति अनेक प्रश्नचिह्न स्थापित कर दिए।
परिणाम-घोषणा के उपरांत भी उनकी ओर से किसी प्रकार की औपचारिक प्रतिक्रिया का अभाव न अभिनंदन, न सार्वजनिक वक्तव्य राजनीतिक विश्लेषकों के लिए रहस्य का विषय बन गया है। यह मौन, वस्तुतः एक संकेत-राजनीति का अंग माना जा रहा है, जिसमें शब्दों की अपेक्षा संकेत अधिक प्रभावशाली होते हैं।
यदि उनके दीर्घ राजनीतिक जीवन का अवलोकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि नीतीश कुमार के निर्णय प्रायः उनके पूर्व वक्तव्यों से भिन्न दिशा में अग्रसर होते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के साथ वैचारिक दूरी का उद्घोष करने के पश्चात पुनः गठबंधन, तथा लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल के साथ वैचारिक विरोध के बावजूद सहयोग ये सभी उदाहरण उनकी राजनीति की परिवर्तनशील प्रकृति को रेखांकित करते हैं।
वर्ष 2013, 2017 तथा 2022 के राजनीतिक पुनर्संयोजन इस तथ्य के प्रमाण हैं कि वे परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति परिवर्तित करने में दक्ष रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें राजनीतिक विमर्श में परिवर्तनशील रणनीतिकार के रूप में भी अभिहित किया जाता है।
वर्तमान परिदृश्य में उनका ध्यान समृद्धि यात्रा और प्रशासनिक गतिविधियों पर केंद्रित होना यह संकेत देता है कि वे जनाधार सुदृढ़ीकरण एवं शासन-प्रदर्शन को प्राथमिकता दे रहे हैं। किन्तु समानांतर रूप से उनके पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है, जहाँ निशांत कुमार की राजनीतिक सक्रियता, पूर्व में परिवारवाद-विरोधी रुख के विपरीत एक नवीन अध्याय का उद्घाटन करती है।
राजनीतिक गलियारों में प्रचलित उक्ति-“जो कहते हैं, वह करते नहीं, और जो करते हैं, वह कहते नहीं” वर्तमान घटनाक्रम में पुनः प्रासंगिक प्रतीत हो रही है। यह कथन उनकी कूटनीतिक गोपनीयता और अप्रत्याशित निर्णय-शैली को अभिव्यक्त करता है।
बहरहाल प्रश्न यह नहीं है कि वे राज्यसभा से दूरी बना रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या यह दूरी किसी निकटवर्ती राजनीतिक पुनर्संरचना की प्रस्तावना है। क्या यह मौन आगामी सत्ता-परिवर्तन का पूर्वाभास है, या मात्र प्रशासनिक व्यस्तता का परिणाम यह अभी भी अनुत्तरित है।
बिहार की राजनीति एक बार पुनः उस बिंदु पर खड़ी है, जहाँ प्रत्येक संकेत, प्रत्येक मौन और प्रत्येक कदम के भीतर एक संभावित राजनीतिक परिवर्तन का बीज निहित है और जब विषय नीतीश कुमार का हो, तब सस्पेंस ही सबसे बड़ा सत्य बन जाता है।
रिपोर्ट- कमलेश कुमार सिंह