Patna Flood: गंगा का रौद्र रूप से पटना की आंखों में आंसू, चिता जलाने के लिए भी जमीन नहीं, सड़क किनारे बेबस जिंदगी
Patna Flood: सैलाब उतर जाएगा, पानी पीछे चला जाएगा, लेकिन हर साल बाढ़ में बेघर होते परिवारों और अंतिम संस्कार के लिए जमीन तलाशते लोगों का दर्द तब तक खत्म नहीं होगा, जब तक स्थायी इंतजाम नहीं किए जाते।...
Patna Flood: पटना में गंगा का मिजाज अब बेहद तल्ख हो चुका है। नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है और लगातार बढ़ता जलस्तर शहर के लिए चिंता का सबब बन गया है। शनिवार की सुबह गांधी घाट पर गंगा का जलस्तर 50.43 मीटर दर्ज किया गया। पानी की बढ़ती रफ्तार ने दियारा इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों की जिंदगी को मुश्किलों में धकेल दिया है। कहीं घरों में पानी घुस गया है तो कहीं लोगों को अपना आशियाना छोड़कर सड़क और ऊंचे स्थानों पर पनाह लेनी पड़ रही है।
गंगा पथ के नीचे बसे बिंद टोली के तमाम घर पानी में डूब गए हैं। पटना सुरक्षा बांध से उत्तर दीघा, एलसीटी घाट, राजापुर और दुजरा के कई घरों में भी बाढ़ का पानी दाखिल हो चुका है। दियारा की गलियों और घरों पर पानी का कब्जा है। जिन चौखटों पर कभी बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां अब सैलाब का शोर सुनाई दे रहा है।
हालात इतने संगीन हैं कि बाढ़ ने लोगों से जीने की जगह ही नहीं, बल्कि मरने के बाद अंतिम संस्कार के लिए जरूरी जमीन तक छीन ली है। दीघा घाट पर अंतिम संस्कार के लिए इस्तेमाल होने वाली अधिकांश जगह गंगा के पानी में समा चुकी है। अब नदी किनारे बची चंद गज सूखी जमीन पर लोग मजबूरी में चिता जला रहे हैं। तेज बहाव और लगातार बढ़ते पानी के बीच अंतिम क्रिया करना परिजनों के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं है।
बाढ़ की मार से बेघर हुए लोग दानापुर के बलदेवा इंटर स्कूल और दीघा के नकटा दियारा व पानापुर दियारा इलाके में शरण लिए हुए हैं। वहीं बिंद टोली के कई परिवारों ने जेपी गंगा पथ को अपना आसरा बना लिया है। सड़क किनारे भूखे-प्यासे बैठे परिवारों की आंखों में बेबसी और आने वाले कल की फिक्र साफ नजर आती है।
अंतिम संस्कार की मुश्किलों को लेकर स्थानीय लोगों का दर्द भी छलक पड़ा। उनका कहना है कि घाट पर अंतिम संस्कार करना बेहद मुश्किल हो गया है। हर साल बाढ़ के दौरान ऐसी नौबत आती है, लेकिन इसका कोई स्थायी इंतजाम नहीं हो पाया। उनका सवाल है कि अगर बाढ़ हर साल आती है तो फिर अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी जरूरत के लिए मुकम्मल व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?घाट पर अंतिम संस्कार के लिए पर्याप्त जगह नहीं बची है। पानी से बाहर निकली थोड़ी-सी जमीन पर ही जैसे-तैसे चिता सजानी पड़ रही है। उनके मुताबिक सरकार की बनाई जगह पूरी तरह पानी में डूब चुकी है और अब बची हुई जमीन पर ही लोग अंतिम क्रिया करने को मजबूर हैं।
यह सिर्फ बाढ़ की तस्वीर नहीं, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक तल्ख सवाल भी है। सैलाब उतर जाएगा, पानी पीछे चला जाएगा, लेकिन हर साल बाढ़ में बेघर होते परिवारों और अंतिम संस्कार के लिए जमीन तलाशते लोगों का दर्द तब तक खत्म नहीं होगा, जब तक स्थायी इंतजाम नहीं किए जाते।