Patna High Court: रजिस्ट्री के बाद 11 लाख की वसूली पर हाईकोर्ट का करारा वार, निबंधन विभागको लगा बड़ा झटका
Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े एक अहम मामले में निबंधन विभाग की कार्रवाई को कानून की कसौटी पर खारिज कर दिया है। ...
Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े एक अहम मामले में निबंधन विभाग की कार्रवाई को कानून की कसौटी पर खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि जब निर्धारित स्टांप शुल्क और अन्य शुल्क जमा कर दस्तावेज स्वीकार कर लिया गया हो, तो बाद में कानून में तय प्रक्रिया का पालन किए बगैर नागरिक पर अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और जुर्माने का बोझ नहीं डाला जा सकता।
जस्टिस राजकुमार की एकलपीठ ने शशि भूषण सिंह की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सहायक महानिरीक्षक, निबंधन, तिरहुत प्रमंडल, मुजफ्फरपुर के 14 जुलाई 2015 के आदेश को रद्द कर दिया। इस आदेश में याचिकाकर्ता पर 10 लाख 13 हजार 400 रुपये अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और 1 लाख 1 हजार 340 रुपये जुर्माना लगाया गया था।
मामला मुजफ्फरपुर में 14 कट्ठा जमीन के बिक्री विलेख के निबंधन से जुड़ा था। यह दस्तावेज सिविल कोर्ट की डिक्री के अनुपालन में तैयार किया गया था। जिला अवर निबंधक ने उपलब्ध अभिलेख और जमीन की प्रकृति के आधार पर शुल्क निर्धारित किया था। याचिकाकर्ता ने पूरी राशि जमा कर दी और 12 दिसंबर 2014 को बिक्री विलेख स्वीकार कर लिया गया। रसीद और टोकन भी जारी कर दिया गया।
लेकिन इसके बाद दस्तावेज याचिकाकर्ता को सौंपने के बजाय करीब साढ़े चार महीने बाद एक अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट के आधार पर जमीन को व्यावसायिक प्रकृति का बता दिया गया। रिपोर्ट में जमीन पर मौजूद झोपड़ी में व्यावसायिक गतिविधि का हवाला दिया गया और इसी आधार पर धारा 47-A के तहत अतिरिक्त स्टांप शुल्क की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि रजिस्ट्री के वक्त ही जमीन की वास्तविक प्रकृति और बाजार मूल्य की जांच करने का पूरा अवसर जिला अवर निबंधक के पास था। जरूरत पड़ने पर अंचलाधिकारी की रिपोर्ट भी ली जा सकती थी। अदालत ने यह भी पाया कि अपर डिविजनल क्लर्क जमीन की प्रकृति तय करने के लिए नियमों के तहत सक्षम लोक प्राधिकारी नहीं था।
अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी हवाला दिया। धारा 47-A(2) के तहत संबंधित पक्ष को कम-से-कम एक महीने का समय देकर अपना पक्ष और साक्ष्य रखने का अवसर देना जरूरी है। लेकिन इस मामले में 6 जुलाई 2015 को नोटिस जारी कर 14 जुलाई को उपस्थित होने को कहा गया और उसी दिन अंतिम आदेश भी पारित कर दिया गया।
राज्य सरकार ने वैकल्पिक अपील का रास्ता होने की दलील दी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जहां मूल स्तर पर कानूनन जरूरी प्रक्रिया ही नहीं अपनाई गई, वहां बाद की अपील उस बुनियादी खामी को दूर नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने 14 जुलाई 2015 का आदेश और 7 फरवरी 2015 की रिपोर्ट दोनों रद्द कर दीं। साथ ही जिला अवर निबंधक, मुजफ्फरपुर को निर्देश दिया कि बिक्री विलेख का चार सप्ताह के भीतर अंतिम निबंधन कर उसे याचिकाकर्ता को सौंपा जाए।इस फैसले ने साफ कर दिया कि रजिस्ट्री और स्टांप शुल्क के मामलों में अफसरशाही मनमानी नहीं चल सकती। कानून में तय प्रक्रिया और नागरिक को सुनवाई का अधिकार सर्वोपरि है।