सलवार खींचना और सीना दबाना रेप नहीं! छेड़छाड़ और दुष्कर्म की कोशिश में क्या है फर्क? पटना हाई कोर्ट ने कानूनी परिभाषा स्पष्ट करते हुए निचली अदालत का बदला फैसला

Patna High Court: उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी महिला को कमरे में बंद करना, उसकी इच्छा के विरुद्ध बल प्रयोग करना, उसके वस्त्र उतारने का प्रयास करना अथवा उसे अनुचित रूप से स्पर्श करना अत्यंत निंदनीय है। लेकिन ...

सलवार खींचना और सीना दबाना रेप नहीं!- फोटो : social Media

Patna High Court: पटना उच्च न्यायालय  ने साल 2008 के एक संगीन इल्ज़ाम के केस  में एक अहम और कानूनी नज़ीर पेश करने वाला फैसला पारित किया है. मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर स्थित छाया स्टूडियो की है,जहाँ स्टूडियो संचालक हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक पर एक युवती को बंधक बनाकर उसके साथ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगा था। इस मामले में वर्ष 2013 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 376 सहपठित धारा 511 दुष्कर्म का प्रयास और धारा 342 अवैध रूप से बंधक बनाना के अंतर्गत तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस सजा के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की थी।

 न्यायमूर्ति पूर्णेदु सिंह की अदालत ने केस के तमाम कागज़ात, बयानात और सामग्री कानए सिरे से मुआयना किया. अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की तरफ से पेश किए गए गवाहान में से स्वतंत्र गवाहअपने बयान से मुकर गया था. इसके अलावा, सबसे बड़ी कानूनी ख़ामी यह रही कि जांच अधिकारी जिसने इस मामले की तफ्तीश की थी,उसे अदालत में बतौर गवाह पेश ही नहीं किया गया,जिससे क्रॉस-एग्जामिनेशन का मौका नहीं मिल सका.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में कोई मेडिकल साक्ष्य या डॉक्टर की गवाही मौजूद नहीं थी, जो ज़्यादती या उसके ठोस प्रयास की पुष्टि कर सके.चूंकि पीड़िता के पिता इच्छुक गवाह  के दायरे में आते हैं, लिहाज़ा कानूनन उनके बयानात की तस्दीक किसी आज़ाद गवाही से होनी लाज़मी थी, जो इस केस में गायब थी.ऐसे बयानों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र साक्ष्य आवश्यक थे। जिस पुलिस अधिकारी ने मामले की जांच कर आरोप पत्र दाखिल किया था, उसे न्यायालय में गवाही के लिए प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, पीड़िता का कोई चिकित्सीय परीक्षण (मेडिकल एग्जामिनेशन) नहीं कराया गया और न ही किसी डॉक्टर की गवाही हुई।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन की पूरी कहानी को सही भी मान लिया जाए, तब भी आरोपी की हरकतें महिला की लज्जा भंग करने की श्रेणी में आती हैं, न कि दुष्कर्म के प्रयास की। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी महिला को कमरे में बंद करना, उसकी इच्छा के विरुद्ध  सीना दबाना, उसे कमरे में बंद करना और उसकी सलवार उतारने का प्रयास करना अथवा उसे अनुचित रूप से स्पर्श करना अत्यंत निंदनीय है। यह कृत्य निश्चित रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा और मर्यादा को भंग करने का अपराध गठित करता है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा, शारीरिक प्रवेश (पेनेट्रेशन) के किसी भी साक्ष्य या संकेत के बिना, चाहे वह कितना भी आंशिक क्यों न हो, केवल मर्यादा भंग करने वाले कृत्यों के आधार पर दुष्कर्म के प्रयास (धारा 376/511) का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके आवश्यक विधिक तत्वों को साबित करने के लिए सुस्पष्ट कृत्य और चिकित्सीय संपुष्टि अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट  में हुई देरी के लिए पीड़िता के परिवार को उत्तरदायी नहीं माना, क्योंकि पुलिस ने समय पर शिकायत लिखने से मना कर दिया था। तथापि, साक्ष्यों के अभाव और विधिक मापदंडों के पूरा न होने के कारण, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा वर्ष 2013 में दिए गए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया। अभियुक्त को धारा 376/511 के आरोपों से बरी करते हुए उसके जमानत बांड को निरस्त करने तथा जमा की गई जुर्माने की राशि को वापस लौटाने का आदेश जारी किया गया।