मधेपुरा में देश की पहली सामुदायिक महिला माइक्रो वेट लैब शुरू:₹50 में होंगी 4 जांचें,पशु सखियों के हाथ में कमान

बिहार के मधेपुरा जिले में ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण और पशुपालन क्षेत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कदम उठाया गया है। जिले की 'दामगारा महिला बकरी किसान उत्पादक संस्था' ने सरकार के सहयोग से राज्य ही नहीं, बल्कि देश की पह

मधेपुरा: बिहार के मधेपुरा जिले में ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण और पशुपालन क्षेत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कदम उठाया गया है। जिले की 'दामगारा महिला बकरी किसान उत्पादक संस्था' ने सरकार के सहयोग से राज्य ही नहीं, बल्कि देश की पहली सामुदायिक स्वामित्व वाली माइक्रो वेटेरिनरी प्रयोगशाला (माइक्रो वेट लैब) की स्थापना कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पूरी तरह से ग्रामीण महिलाओं और पशुपालकों द्वारा संचालित होने वाली इस अनूठी लैब का मुख्य उद्देश्य सुदूर ग्रामीण इलाकों में पशुओं को त्वरित, वैज्ञानिक और सटीक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है। इसके साथ ही मुरलीगंज के निकट सहुरिया गांव में एक आधुनिक लाइवस्टॉक ट्रेड केंद्र और लाइव वेट मूल्यांकन केंद्र की भी भव्य शुरुआत की गई है, जो बकरियों के वजन के आधार पर उनका सही बाजार मूल्य निर्धारण करने और पशुपालकों को हर प्रकार की उन्नत तकनीकी ट्रेनिंग देने का काम मुस्तैदी से करेगा।

इस नवनिर्मित माइक्रो वेट लैब की सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद किफायती, सुलभ और पूरी तरह वैज्ञानिक होना है, जो सीधे तौर पर छोटे किसानों को संबल देगा। अब स्थानीय गरीब और सीमांत किसानों को अपने बीमार पशुओं की प्राथमिक जांच या रिपोर्ट के लिए जिला मुख्यालय की लंबी और खर्चीली दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। इस आधुनिक लैब के माध्यम से अब गांवों में ही बकरियों के गोबर, मूत्र, रक्त और परजीवी से जुड़ी चार सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक जांचें मात्र ₹50 के नाममात्र और किफायती शुल्क पर की जाएंगी। राहत की बात यह भी है कि इसकी बिल्कुल सटीक रिपोर्ट किसानों को बिना किसी लंबी प्रतीक्षा के महज 2 से 3 घंटे के भीतर मिल जाएगी। इस पूरी अत्याधुनिक व्यवस्था को जमीन पर सुचारू रूप से उतारने का जिम्मा द गोट ट्रस्ट द्वारा 'जीव कल्याण' परियोजना के तहत विशेष रूप से प्रशिक्षित और कौशल-युक्त की गईं 120 'पशु सखियों' के मजबूत नेटवर्क को सौंपा गया है। 

यह पूरी क्रांतिकारी और दूरगामी पहल 'द गोट ट्रस्ट' द्वारा 'आरबीएल के सहयोग से चलाई जा रही 'जीव कल्याण - क्लस्टर दृष्टिकोण से सतत पशु स्वास्थ्य सेवा और उत्पादकता संवर्धन' परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दूरदर्शी परियोजना का व्यापक और सकारात्मक असर अब तक देश के 5 राज्यों के लगभग 225 गांवों में बड़े पैमाने पर देखा जा चुका है। इस कल्याणकारी कार्यक्रम के तहत क्लस्टर समन्वयकों और स्थानीय पशु सखियों को न सिर्फ उच्च स्तरीय चिकित्सा प्रशिक्षण दिया गया है, बल्कि उन्हें फील्ड में काम करने के लिए जरूरी सभी वेटेरिनरी किट भी बांटे गए हैं। जमीन पर अब तक 204 से अधिक सफल पशु स्वास्थ्य शिविरों के आयोजन और वैज्ञानिक तरीकों से बड़े पैमाने पर पशुओं का कृमिनाशन, नियमित टीकाकरण, खुर कटाई व वैज्ञानिक बधियाकरण कर ग्रामीण पशुपालन की पूरी पारंपरिक रूपरेखा और सोच को आधुनिकता में बदल दिया गया है।

इस वैज्ञानिक और क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण का सीधा, स्पष्ट और सकारात्मक आर्थिक असर अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालक किसानों की जेब पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। आंकड़ों के मुताबिक, परियोजना के इस प्रभावी हस्तक्षेप से छोटे पशुओं (बकरियों) की मृत्यु दर 35% से घटकर सीधे 15% पर आ गई है, जबकि बड़े पशुओं की मृत्यु दर भी 10% से गिरकर मात्र 5% पर सिमट गई है। इस बड़ी राहत के चलते पशु हानि में भारी कमी आई है और प्रति किसान को औसतन ₹6,000 का सीधा और साफ आर्थिक मुनाफा हुआ है। इसके अलावा, संतुलित और पूरक आहार व उन्नत चारे के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने से किसानों की चारा लागत में भी प्रति छोटे पशु ₹1,000 और बड़े पशु पर ₹2,000 तक की बड़ी बचत रिकॉर्ड की गई है। साथ ही, पशुओं के ब्याने से दोबारा गर्भधारण करने का समय 150 दिन से घटकर महज 100 दिन हो गया है, जिससे पशुओं की उत्पादकता और क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

द गोट ट्रस्ट के प्रतिनिधियों और दामगारा संस्था के प्रबंधकों के मुताबिक, इस 'जीव कल्याण' परियोजना ने जमीन पर यह पूरी तरह साबित कर दिया है कि जब समुदाय के नेतृत्व में और महिलाओं के हाथ में पशु स्वास्थ्य सेवाएं सौंपी जाती हैं, तो वह सीधे किसान की आय और पशुओं की उत्पादकता में एक बड़ा और टिकाऊ बदलाव ला सकती हैं। मधेपुरा की यह माइक्रो लैब और सहुरिया का यह आधुनिक ट्रेस सेंटर असल में इसी क्लस्टर आधारित और आत्मनिर्भर मॉडल की अगली मजबूत कड़ी हैं, जहाँ अब गांव के भीतर ही विज्ञान, बाजार और सेवा तीनों एक साथ उपलब्ध करा दिए गए हैं। परियोजना ने 120 प्रशिक्षित पशु सखियों का एक ऐसा स्थायी और आत्मनिर्भर नेटवर्क तैयार कर दिया है, जो इस प्रोजेक्ट की अवधि समाप्त होने के बाद भी पूरी निष्ठा से गांवों में अपनी सेवाएं देता रहेगा। मधेपुरा का यह अनूठा प्रयोग आज पूरे देश में क्लस्टर आधारित, मापनीय और टिकाऊ पशुधन विकास के लिए एक अनुकरणीय और बेहतरीन मॉडल के रूप में स्थापित हो रहा है।