शेयर बाज़ार में हाहाकार, कुछ ही मिनटों में निवेशकों के 8 लाख करोड़ स्वाहा, सेंसेक्स-निफ्टी हुआ धड़ाम
India Stock Market Crash: हफ्ते की शुरुआत भारतीय शेयर बाज़ार के लिए झटकेदार रही, जब S&P BSE Sensex और NSE Nifty50 दोनों ही भारी गिरावट के साथ खुले।...
India Stock Market Crash: हफ्ते की शुरुआत भारतीय शेयर बाज़ार के लिए झटकेदार रही, जब S&P BSE Sensex और NSE Nifty50 दोनों ही भारी गिरावट के साथ खुले। सुबह 9:30 बजे तक सेंसेक्स 1243 अंकों की गिरावट के साथ 73,289.96 पर आ गया, जबकि निफ्टी 413 अंकों का गोता लगाकर 22,700.65 के स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट महज़ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि ग्लोबल और घरेलू इकोनॉमिक दबावों का साफ़ इशारा है।
अर्थशास्त्री डॉ रामानंद पाण्डेय के मुताबिक, इस गिरावट की जड़ में पश्चिम एशिया में जारी जंग और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें हैं। जियो-पॉलिटिकल टेंशन ने निवेशकों के भरोसे को झटका दिया है, जिससे मार्केट में भारी बिकवाली का माहौल बन गया। अर्थशास्त्री डॉ रामानंद पाण्डेय के अनुसार जंग का कोई क्लियर एंड-गेम नजर नहीं आ रहा, जिससे अनिश्चितता और बढ़ रही है।
इस बिकवाली का सीधा असर निवेशकों की दौलत पर पड़ा। कुछ ही मिनटों में बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप ₹429 लाख करोड़ से घटकर ₹421 लाख करोड़ रह गया यानी करीब ₹8 लाख करोड़ की वैल्यूएशन वाइप-आउट। यह गिरावट निवेशकों के सेंटिमेंट पर गहरी चोट कर रही है।
करेंसी मार्केट में भी दबाव साफ दिखा, जहां भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए रिस्क बढ़ाता है, जिससे FII आउटफ्लो तेज हो सकता है और मार्केट पर और दबाव बनता है।
बकौल अर्थशास्त्री डॉ रामानंद पाण्डेय सबसे बड़ा ट्रिगर बना है कच्चा तेल, जिसकी कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई है। भारत, जो अपनी 80% से ज्यादा तेल जरूरतों के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर है, उसके लिए यह बड़ा मैक्रो-इकोनॉमिक खतरा बनता जा रहा है। बढ़ता आयात बिल, चालू खाता घाटा और महंगाई तीनों मिलकर ग्रोथ की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं।
अर्थशास्त्री डॉ रामानंद पाण्डेय के अनुसार क्रूड में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी GDP ग्रोथ को 30-40 बेसिस पॉइंट तक कम कर सकती है। ऐसे में अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत की विकास दर 7 फीसदी से नीचे खिसक सकती है।
अर्थशास्त्री डॉ रामानंद पाण्डेय का कहना है कि मौजूदा गिरावट एक शॉर्ट-टर्म करेक्शन नहीं, बल्कि ग्लोबल अनिश्चितताओं, महंगे तेल और कमजोर होती करेंसी का कॉम्बिनेशन है, जिसने बाज़ार को रेड ज़ोन में धकेल दिया है। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजरें अब जियो-पॉलिटिकल हालात और कमोडिटी प्राइस मूवमेंट पर टिकी रहेंगी।