संसद में चौंकाने वाली रिपोर्ट: UP-बिहार और असम में 12वीं तक आते-आते आधी लड़कियां क्यों छोड़ देती हैं स्कूल?
केंद्र सरकार ने संसद में आंकड़े पेश करते हुए बताया है कि देश में 12वीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते लगभग हर दूसरी लड़की स्कूल छोड़ देती है।असम में ड्रॉपआउट दर सबसे अधिक, यूपी और बिहार में भी 12वीं तक आधी छात्राएं छोड़ देती हैं पढ़ाई।
देश में उच्च शिक्षा (Higher Education) में लड़कियों के बढ़ते नामांकन के दावों के बीच स्कूली शिक्षा से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्राथमिक स्तर (Primary level) से सीनियर सेकेंडरी (12वीं क्लास) तक पहुँचते-पहुँचते लगभग आधी लड़कियाँ पढ़ाई छोड़ देती हैं। सपा सांसद आनंद भदौरिया के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने लोकसभा में लड़कियों के रिटेंशन रेट (Retention Rate) का ब्योरा पेश किया।
प्राथमिक में 92% तो 12वीं में घटकर 55% पर पहुँचा रिटेंशन रेट
संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में प्राथमिक स्तर (प्राइमरी) पर लड़कियों का रिटेंशन रेट (बिना पढ़ाई छोड़े अगली कक्षा में जाने की दर) 92.2 प्रतिशत दर्ज किया गया था। हालाँकि, सीनियर सेकेंडरी यानी 12वीं कक्षा तक आते-आते यह दर गिरकर महज 55 प्रतिशत रह जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में स्कूल जाने वाली हर दूसरी लड़की 12वीं की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाती है।
असम में स्थिति सबसे गंभीर, यूपी-बिहार में भी ड्रॉपआउट दर दोगुनी
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि कई राज्यों में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर दोगुनी या उससे भी अधिक है। इस मामले में असम सबसे ऊपर है, जहाँ प्राथमिक स्तर पर 80% रिटेंशन रेट 12वीं तक पहुँचकर केवल 33% रह जाता है। वहीं उत्तर प्रदेश में यह ग्राफ 87% से गिरकर 45% और बिहार में 90% से घटकर 45% पर आ जाता है। इन राज्यों में 12वीं तक पहुँचते-पहुँचते 50% से अधिक छात्राएँ स्कूल त्याग देती हैं।
उच्च शिक्षा के आंकड़ों और स्कूली हकीकत में बड़ा अंतर
हाल ही में जारी AISHE (ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन) रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश की उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और कुल नामांकन 4.5 करोड़ तक पहुँचा है। लेकिन संसद में आए स्कूली शिक्षा के ये आंकड़े दिखाते हैं कि जमीनी स्तर पर स्कूली पढ़ाई के दौरान ही बड़ी संख्या में लड़कियाँ ड्रॉपआउट का शिकार हो रही हैं, जिससे उच्च शिक्षा तक पहुँचने का उनका सपना शुरुआत में ही टूट जाता है।
सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बन रही हैं रोड़ा
छात्राओं के इस तरह बीच में पढ़ाई छोड़ने के पीछे सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, कम उम्र में शादी, घरेलू जिम्मेदारियाँ, स्कूलों में शौचालयों की कमी और दूरी जैसे कई सामाजिक-आर्थिक कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं। संसद में इस मुद्दे के उठने के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर लड़कियों को 12वीं तक स्कूल में बनाए रखने के लिए विशेष नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं पर गंभीरता से काम करेंगी।