Religion: वेश नहीं, अंतःकरण की विशुद्धि ही होती है असली पहचान! मन, चरित्र और स्वभाव से प्रकट होता है ऐसे व्यक्तित्व का सत्य

Religion: मानव-जीवन का वास्तविक मूल्यांकन बाह्य आडंबर, मधुर वचन या आकर्षक वेशभूषा से नहीं, अपितु अंतःकरण की निर्मलता, चरित्र की दृढ़ता और स्वभाव की सात्त्विकता से होता है।...

वेश नहीं, अंतःकरण की विशुद्धि ही होती है असली पहचान!- फोटो : X

Religion: मानव-जीवन का वास्तविक मूल्यांकन बाह्य आडंबर, मधुर वचन या आकर्षक वेशभूषा से नहीं, अपितु अंतःकरण की निर्मलता, चरित्र की दृढ़ता और स्वभाव की सात्त्विकता से होता है। बाबा तुलसी ने कहते हैं-

“बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारी।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख बिचारी॥”

अर्थात् केवल वचन और वेश देखकर किसी नर-नारी का यथार्थ स्वरूप ज्ञात नहीं किया जा सकता। यदि मन मलिन है, तो बाह्य सज्जा, मधुर भाषण और दैदीप्यमान व्यक्तित्व भी निष्प्रयोज्य सिद्ध होते हैं। मन की शुद्धि ही विचारों की पवित्रता को जन्म देती है, और विचार ही व्यवहार का मूलाधार होते हैं। विचार-विकृति से आचरण विकृत होता है, और आचरण-विकृति से जीवन का पतन सुनिश्चित हो जाता है।

भारतीय धर्म-दर्शन में ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ की एकात्मकता को अत्यंत महत्त्व प्रदान किया गया है। यदि अंतःकरण में कपट, द्वेष, लोभ अथवा अहंकार का निवास है, तो बाह्य सौंदर्य केवल आवरण मात्र रह जाता है। इस सत्य को धर्मग्रंथों के विविध प्रसंगों द्वारा अत्यंत सशक्त रूप से प्रतिपादित किया गया है।

शूर्पणखा सुंदर रूप धारण कर उपस्थित हुई, किंतु उसके अंतर्मन में वासना, प्रतिशोध और विकृति का संचार था। उसका बाह्य आकर्षण क्षणिक था, किंतु अंतःकरण की कलुषता ने उसे विनाश के मार्ग पर अग्रसर किया।

इसी प्रकार मरीच स्वर्ण-मृग के मोहक रूप में प्रकट हुआ। उसका स्वरूप अत्यंत मनोहर था, परंतु वह छल और प्रपंच का साधन बना। आकर्षण के माध्यम से उसने धर्म-पथ से विचलन का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि प्रत्येक चमकती वस्तु सुवर्ण नहीं होती।

पूतना मातृत्व के पवित्र आवरण में आई, किंतु उसके स्तनों में अमृत नहीं, अपितु विष भरा था। मातृ-भाव की आड़ में वह संहार का संकल्प लेकर आई थी। यहाँ भी बाह्य रूप और आंतरिक संकल्प में तीव्र विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है।

रावण दशानन, महान पंडित, वेद-वेदांगों का ज्ञाता, तपस्वी और पराक्रमी था। किंतु उसके अंतःकरण में अहंकार, दुराग्रह और अधर्म का विष व्याप्त था। विद्वत्ता और तेजस्विता भी तब व्यर्थ हो जाती है, जब मन में धर्मनिष्ठा का अभाव हो।

इन समस्त उदाहरणों का सार यही है कि स्वभाव, भाव और आचरण ही जीवन का वास्तविक आधार हैं। वाणी की मधुरता यदि हृदय की निर्मलता से संयुक्त न हो, तो वह केवल छलावरण बन जाती है। बाह्य शुचिता का महत्त्व तभी है, जब अंतःकरण भी शुद्ध, करुणामय और धर्ममय हो।

आज के डिजिटल युग में, जहाँ छवि-निर्माण और प्रस्तुति-कौशल को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है, वहाँ यह संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है। सोशल माध्यमों पर प्रदर्शित व्यक्तित्व, वास्तविक चरित्र का प्रतिरूप नहीं होता। अतः विवेक, परीक्षण और अंतरदृष्टि आवश्यक है।

मानव की असली पहचान उसके सत्कर्म, सद्विचार और सदाचरण से होती है। यही कारण है कि संत-महात्मा सदैव नाम-स्मरण और धर्म-पथ का अनुसरण करने का उपदेश देते हैं। “श्री सीताराम” नाम का जप अंतःकरण की शुद्धि का माध्यम है, और सत्कर्म-पथ पर चलना जीवन की सार्थकता का साधन।

अतः स्मरण रहे वेश परिवर्तनशील है, वाणी अभ्यास से मधुर हो सकती है, किंतु मन की पवित्रता ही शाश्वत पहचान है। चरित्र की दृढ़ता और स्वभाव की सात्त्विकता ही मनुष्य को वास्तविक सम्मान प्रदान करती है। शेष सब कुछ क्षणभंगुर और निरर्थक है।

कौशलेंद्र प्रियदर्शी की कलम से