सावन की सोमवारी पर बिहार के सोमेश्वरनाथ महादेव में जरुर करें जलाभिषेक, भगवान राम की पूरी हुई थी आराधना
मान्यता है कि महर्षि अगस्त्य ने उन्हें नेपाल से सटे नारायणी नदी के तट पर स्थित अरण्यराज (वर्तमान अरेराज) में पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना करने का निर्देश दिया। विवाह के बाद भगवान श्रीराम और माता सीता अरेराज पहुंचे थे
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। बिहार में सावन की सोमवारी के दौरान लाखों श्रद्धालु विभिन्न शिवालयों में जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। पूर्वी चंपारण जिले के अरेराज स्थित बाबा सोमेश्वरनाथ महादेव मंदिर भी इन्हीं प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल नहीं होने के बावजूद यह मंदिर अमरनाथ और पशुपतिनाथ की तरह श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। सावन के महीने में यहां देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों कांवरिये गंगाजल और अन्य पवित्र नदियों का जल लेकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
चंद्रमा ने की थी पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या से जुड़े प्रसंग में चंद्रमा (सोम) की संदिग्ध भूमिका से नाराज होकर महर्षि गौतम ने उन्हें शाप दे दिया था। कहा जाता है कि शाप के प्रभाव से चंद्रमा का पूरा शरीर घावों से भर गया और वे कलंकित हो गए। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने महर्षि अगस्त्य की शरण ली।
मान्यता है कि महर्षि अगस्त्य ने उन्हें नेपाल से सटे नारायणी नदी के तट पर स्थित अरण्यराज (वर्तमान अरेराज) में पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना करने का निर्देश दिया। चंद्रमा ने यहां विधि-विधान से शिवलिंग की स्थापना की और शिव कृपा से उनके शरीर के घाव समाप्त हो गए तथा उन्हें कलंक से भी मुक्ति मिली। तभी से यह स्थान सोमेश्वरनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भगवान राम और माता सीता के आगमन की भी है मान्यता
स्थानीय धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार विवाह के बाद भगवान श्रीराम और माता सीता अरेराज पहुंचे थे। यहां उन्होंने कमल पुष्पों से भगवान सोमेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना की। कहा जाता है कि भगवान राम ने मंदिर से माता पार्वती के मंदिर तक लाल वस्त्र की पगड़ी बिछवाई थी। इसी मान्यता के कारण आज भी यहां पगड़ी चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है। यह भी मान्यता है कि भगवान राम ने यहां पुत्र प्राप्ति की कामना की थी, जबकि माता सीता ने मां पार्वती को सिंदूर अर्पित कर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगा था। इसी कारण विवाहित महिलाएं आज भी यहां सिंदूर अर्पित कर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
रामायण यात्रा में भी मिलता है उल्लेख
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि जनकपुर से चित्रकूट तक भगवान राम और माता सीता की यात्रा से जुड़े स्थलों का अध्ययन करने वाली 'जय जीवन जानकी यात्रा' के दौरान प्रकाशित साहित्य में भी अरेराज का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर श्रद्धालु इस स्थान को राम-जानकी से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ मानते हैं।
पांडवों ने भी किया था सावन भर पूजन
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर धर्मराज युधिष्ठिर, द्रौपदी और अन्य पांडव अरेराज पहुंचे थे। यहां उन्होंने सावन भर भगवान सोमेश्वरनाथ की आराधना की, जिसके बाद उन्हें पुनः राज्य और समृद्धि प्राप्त हुई। इसी कारण इस मंदिर को मनोकामना पूर्ण करने वाला शिवधाम भी माना जाता है।
रोट चढ़ाने और लोकनृत्य की अनूठी परंपरा
अरेराज मंदिर की कई अनूठी परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। मान्यता है कि जो महिलाएं चावल के आटे और शुद्ध घी से बना 'रोट' भगवान शिव को अर्पित करती हैं, उनके घर अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती। इसके अलावा, मनोकामना पूरी होने पर महिलाएं अपने आंचल की खूंट पर लोक कलाकारों से नृत्य करवाकर भगवान शिव के प्रति आभार प्रकट करती हैं। इसे भी यहां की विशिष्ट धार्मिक परंपरा माना जाता है।
एक लाख कमल पुष्पों से होता है महाशृंगार
सोमेश्वरनाथ मंदिर का महाशृंगार देशभर में प्रसिद्ध है। विशेष अवसरों पर भगवान शिव का श्रृंगार एक लाख से अधिक कमल पुष्पों से किया जाता है। इस दौरान चांदी से निर्मित विशाल नागों से शिवलिंग का अलंकरण किया जाता है। शंखध्वनि और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बीच होने वाला यह महाशृंगार श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है।
कई घाटों से जल लेकर पहुंचते हैं कांवरिये
सावन में श्रद्धालु पताही के बेलवा घाट, बक्सर के रामरेखा घाट, पहलेजा घाट, डोरीगंज, वाल्मीकिनगर, गोविंदगंज सहित गंडक और गंगा के विभिन्न घाटों से कांवर में जल भरकर पैदल अरेराज पहुंचते हैं और बाबा सोमेश्वरनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
प्राचीन मंदिर होने का भी दावा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सोमेश्वरनाथ मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईंटें लगभग ढाई से तीन हजार वर्ष पुरानी हैं। मंदिर और इसकी महिमा का उल्लेख 'रोटक व्रत कथा', 'अरेराज धाम', 'तीर्थराज अरेराज', 'स्कंदपुराण नेपाल महात्म्य' सहित कई धार्मिक ग्रंथों में भी बताया जाता है। सावन की प्रत्येक सोमवारी पर यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि बाबा सोमेश्वरनाथ आज भी करोड़ों शिवभक्तों की आस्था और विश्वास के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।
हिमांशु की रिपोर्ट