Bihar vidhansabh Chunav 2025: 1994 की कुर्मी चेतना रैली ने लालू के खिलाफ नीतीश को बनाया था हीरो,11 साल बाद बने बिहार के CM, जातीय रैली से जननायक बनने की पूरी कहानी...पढ़िए

Bihar vidhansabh Chunav 2025: 1994 में कुर्मी चेतना रैली ने लालू के खिलाफ नीतीश कुमार को हीरो बना दिया था। 11 साल पहले बिहार के सीएम कैसे जातीय रैली से जननायक बने आइए इसकी पूरी कहानी समझते हैं...

Kurmi Chetna Rally
Kurmi Chetna Rally - फोटो : news4nation

Bihar vidhansabh Chunav 2025: बिहार में सियासी तौर पर कुर्मी समाज की भागेदारी कम होते जा रही है. ये हाल तब है जब कुर्मी समाज के सबसे बड़े नेता नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री हैं. साल 2015 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कुल 16 कुर्मी विधायक जीतकर आए थे और जब साल 2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तब कुल कुर्मी समाज के विधायक 9 रह गए. नीतीश कुमार ने 31 साल पहले पटना के गांधी मैदान में कुर्मी समाज को लेकर कहा था भीख नहीं हिस्सेदारी चाहिए, जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करती है वो सरकार सत्ता में रह नहीं सकती. पटना में गांधी मैदान में 12 फरवरी 1994 को कुर्मी चेतना रैली बुलाई गई थी. तब कुर्मी समाज के लोग ट्रेन, बसों में भर भरकर पटना पहुंचे थे और इस रैली में शिरकत किया था. इस रैली ने नीतीश कुमार को ऐसा स्थापित किया कि वो 18 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं. कुर्मी चेतना रैली में ऐसा क्या हुआ था कि नीतीश कुमार हीरो बनकर उभरे. आगे एक-एक चीज विस्तार से पढ़िए.

कुर्मी चेतना रैली

कुर्मी चेतना रैली का आयोजन कम्युनिस्ट नेता सतीश कुमार, भोलानाथ सिंह, ब्रह्मानंद मंडल के तरफ से किया गया था. कहा जाता है कि नीतीश कुमार इस रैली नहीं शिरकत नहीं करना चाहते थे. लेकिन सतीश कुमार के बार-बार आग्रह करने पर वो इस रैली में शामिल हुए थे. आखिरी समय तक नीतीश कुमार इस असमंजस में थे कि किसी जातीय रैली में जाएं या न जाएं? उनके इस कंफ्यूजन को खुद लालू यादव और तब उनके अच्छे मित्र रहे विजय कृष्ण ने दूर किया था. लालू यादव ने उन्हें जबरदस्ती इस रैली में भेजा. लालू यादव ने नीतीश कुमार से तब कहा था अगर कुर्मी चेतना रैली में नहीं गए तो सतीश कुमार कुर्मियों का हीरो बन जाएगा. लेकिन लालू यादव ने तब सोचा भी नहीं होगा कि रैली में नीतीश कुमार उनका सियासी खेल खराब कर देंगे. कुर्मी चेतना रैली में तब नीतीश कुमार ने अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री लालू यादव को पहली बार ललकारा था. इस रैली के बाद न केवल लालू यादव और नीतीश कुमार की दोस्ती टूटी थी, बल्कि बिहार की सियासत एक सिरे शुरू हुई थी. 

कुर्मी के खिलाफ हो रही थी साजिश ?

1990 में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से जनता दल की सरकार बनी थी. लालू यादव मुख्यमंत्री थे. इस दौरान बिहार में जातीय हिंसा ने एक विकराल रूप ले लिया था. लोगों की हत्या जाति पूछकर की जा रही थी. इतना ही नहीं, आरक्षण में भारी बदलाव की तैयारी शुरू हो गई थी. क्रीमी लेयर के नाम पर कुर्मी को आरक्षण से बाहर करने की तैयारी थी. इसी विरोध में पटना में कुर्मी चेतना रैली का आयोजन किया गया था. कुर्मी चेतना रैली का पहला बड़ा असर ये रहा कि कुर्मी आरक्षण से बाहर होने बच गए.  

रैली में क्या-क्या हुआ देखिए

नीतीश कुमार जैसे ही कुर्मी चेतना रैली के मंच पर चढ़े, जिंदाबाद के नारे लगने लगे थे. भाषण की शुरुआत में नीतीश कुमार ने लालू यादव का बचाव आरक्षण के मुद्दे को लेकर करने की कोशिश की थी. तभी लोगों ने चप्पल फेंकना शुरू कर दिया. उन्होंने नीतीश कुमार से कहा कि बात साफ रहनी चाहिए. दूर-दूर से आए लोग टालमटोल बर्दाश्त नहीं करेंगे, वे सीधे-सीधे अपनी मांगों के बारे में सुनना चाहते हैं. तब नीतीश कुमार ने दो टूक नारा दिया कि ‘भीख नहीं हिस्सेदारी चाहिए’, ‘जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करती है, वो सरकार सत्ता में रह नहीं सकती’. इसके बाद तो नीतीश कुमार सीधे लालू यादव पर फूट पड़े थे. इस रैली से पहले ही राज्य भर के कुर्मियों में आक्रोश का पनप रहा था. सरकार में नीतीश कुमार की राय को लगातार नजरअंदाज किया जाने लगा था. अतिपिछड़ा के आरक्षण के साथ छेड़छाड़ पर नीतीश कुमार ने 1993 में ही लालू को चेताया था कि इस फॉर्मूले से छेड़छाड़ गैर-यादव ओबीसी बर्दाश्त नहीं करेगा. इसके बाद भी वे मानने को तैयार नहीं थे। इतना ही नहीं, कुर्मी चेतना रैली से पहले पटना में जनता दल की एक बड़ी रैली हुई थी. इसमें वीपी सिंह भी शामिल हुए थे लेकिन इस रैली के पोस्टर से ही नीतीश कुमार को गायब कर दिया गया था. नीतीश कुमार के मित्र विजय कृष्ण पहले ही बगावती तेवर अपना लिए थे. नीतीश कुमार जिस उधेड़बुन में थे उसे दूर करने में कुर्मी चेतना रैली ने सहायक भूमिका निभाई थी. 

लालू से अलग होना चाहते थे नीतीश

इस रैली से पहले लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच एक गहरी खाई बन चुकी थी. नीतीश कुमार उनसे अलग तो होना चाहते थे लेकिन रिस्क नहीं लेना चाहते थे. एक रिपोर्ट की मानें तो नीतीश कुमार ने लालू यादव के नाम पत्र लिखकर उन्हें यहां तक कह दिया था कि वे लालू से बात नहीं करना चाहते हैं. लेकिन वे सियासत में रिस्क लेने से बच रहे थे. ऐसे में सतीश कुमार की तरफ से तैयार कुर्मी एकता रैली का ये मंच उन्हें बगावत के लिए सबसे मुफीद लगा. यहीं से उन्होंने लालू के खिलाफ बगावत की आवाज बुलंद कर दी.

कुर्मी एकता रैली रोकना चाहते थे लालू

कुर्मी एकता रैली के सूत्रधार सतीश कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा था पटेल सेवा संघ की बैठक में रैली के आयोजन का निर्णय लिया गया था. पहली मीटिंग में मात्र 17 लोग पहुंचे थे, लेकिन तीन सप्ताह बाद इसमें 600 लोग शामिल हुए. इसके बाद राज्य भर से लोगों को लोगों का जुटाने का निर्णय लिया गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव खुफिया नजर रखवा रहे थे. शुरुआत में उन्हें लग रहा था कि इस रैली का आयोजन ही संभव नहीं हो पाएगा. इसके बाद इसे हाइजैक करने की कोशिश भी की गई. लालू यादव लगातार इस रैली की तैयारी पर नजर रख रहे थे. जब रैली के दिन नजदीक आने लगे, तब उनके लोग उनके पास आने लगे. लालू यादव इस रैली में मुख्य अतिथि बनना चाहते थे. इसके लिए उनकी तरफ से इस रैली का सारा खर्च देने की बात भी कही गई थी. लालू यादव 3-4 करोड़ रुपए देने के लिए तैयार भी हो गए थे, लेकिन सतीश कुमार की ये पूरी रैली सरकार के ही खिलाफ थी. उन्होंने लालू यादव के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया. सतीश कुमार कहते हैं कि उनकी कोशिश इस रैली को हाईजैक करने की थी. लालू की तैयारी थी कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में कोईरी-कुर्मी और यादव मिल गए तो सत्ता से कोई हटा नहीं सकता है.लालू यादव के पास इस कुर्मी चेतना रैली की पूरी खुफिया रिपोर्ट थी. उन्हें पता था कि रैली में बड़ी संख्या में लोग राज्य भर से पहुंच रहे हैं. ऐसे में पहले वे इस रैली को हाइजैक करने की कोशिश किए. जब इसमें वे असफल हुए तब उन्होंने अपने साथी नीतीश कुमार को इसमें भेजने का निर्णय लिया. 

रैली बाद हुआ समता पार्टी का गठन 

कुर्मी एकता रैली के बाद नीतीश अपनी नई पार्टी के गठन में जुट गए. इस रैली के 8 महीने बाद नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडीस ने मिलकर में समता पार्टी बनाई. लालू यादव के खिलाफ नीतीश कुमार की पॉलीटिक्स अब चरम पर पहुंच चुकी थी. और नीतीश कुमार को करीब 11 वें साल बाद अपने मिशन में सफलता हाथ लगी. नीतीश कुमार ने 2005 में लालू यादव को बिहार की सत्ता से बाहर कर दिया था. 

सियासी रूप से कुर्मी की ताजा स्थिति

साल 2023 में हुए बिहार में जाति आधारित सर्वे के रिपोर्ट के मुताबिक कुर्मी की आबादी 2.87 फीसदी है. बिहार में कुर्मी समाज के कुल 9 विधायक है. 1- श्रवण कुमार, नालंदा जेडीयू विधायक, 2- कृष्ण कुमार मंटू, अमनौर, बीजेपी विधायक, 3- पन्ना लाल पटेल, बेलदौर, जेडीयू विधायक, 4- हरि नारायण सिंह, हरनौत, जेडीयू विधायक, 5-सिद्धार्थ पटेल, वैशाली, जेडीयू, 6- जितेंद्र कुमार, अस्थावां, जेडीयू विधायक, 7-कृष्ण मुरारी शरण, हिलसा, जेडीयू विधायक, 8- अशोक कुमार, वारिसनगर, जेडीयू विधायक, 9-अवधेश कुमार, हाजीपुर, बीजेपी विधायक. झाझा के जेडीयू के दामोदर रावत कुर्मी की उप जाति के विधायक हैं।

देवांशू प्रभात की रिपोर्ट

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