Nepal Flood:इंसान के यूरिन से पिघल रही ग्लेशियर की बर्फ, बिना बारिश आई नेपाल की जलप्रलय का खौफनाक सच जान कर उड़ जाएंगे होश

Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में बिना बारिश अचानक आई जलप्रलय ने पूरे इलाके को दहला दिया। ...

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:इंसान के यूरिन से पिघल रही ग्लेशियर की बर्फ- फोटो : social Media

Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में बिना बारिश अचानक आई जलप्रलय ने पूरे इलाके को दहला दिया। साफ आसमान के नीचे आई यह आफत महज कुदरत का कहर नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी के खिलाफ लंबे समय से चल रहे इंसानी जुर्म का खौफनाक नतीजा भी हो सकती है। वैज्ञानिक भाषा में ऐसी घटनाओं को ग्लेशियर लेक बर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है—जब पिघलती बर्फ से बनी ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है और पानी अचानक घाटियों में मौत का सैलाब बनकर उतरता है।सबसे चौंकाने वाली बात एवरेस्ट बेस कैंप से जुड़ी है। बढ़ते पर्यटन ने कभी साधारण पर्वतारोहण पड़ाव रहे इस इलाके को मौसमी शहर में बदल दिया है। 2023 के एक सीजन में ईंधन जलने से करीब 2,338 टन बर्फ पिघलने का अनुमान लगाया गया, जबकि मानव यूरिन से निकलने वाली गर्मी से लगभग 154 टन बर्फ पिघलने की बात अध्ययन में कही गई। यानी मामला सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग का नहीं है। 

हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। एवरेस्ट क्षेत्र के 15 ग्लेशियरों पर हुए अध्ययन में 1976 से 2007 के बीच औसतन करीब 28 मीटर सालाना पीछे हटने की बात सामने आई। खूंबू ग्लेशियर भी लगातार सिकुड़ रहा है। यह महज आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाली तबाही का रेड अलर्ट है।

26 अगस्त को नेपाल में बिना बारिश अचानक आई जलप्रलय ने हर किसी को सन्न कर दिया। आसमान साफ था, मौसम में कोई ऐसा संकेत नहीं था जो इतनी बड़ी आफत की आहट देता। फिर भी देखते ही देखते पानी का ऐसा सैलाब उमड़ा कि रसुवा, नुवाकोट और धादिंग के इलाकों में तबाही का मंजर दिखाई देने लगा। विज्ञान की भाषा में ऐसी घटना को ग्लेशियर लेक बर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ऊंचाई पर बनी झीलों में पानी बढ़ता है और जब प्राकृतिक बांध जवाब दे देते हैं, तो वही पानी अचानक मौत का सैलाब बनकर नीचे उतरता है।मामला सिर्फ एक दिन की तबाही का नहीं है। हिमालय में ग्लेशियरों का सिकुड़ना अब कोई दूर की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि आंखों के सामने घट रही हकीकत है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की तलहटी में मौजूद खूंबू ग्लेशियर करीब 17 किलोमीटर लंबा है और उसी बर्फीले इलाके से जुड़ा है, जहां खतरनाक खूंबू आइसफॉल मौजूद है।

आंकड़े इस संकट की गंभीरता का खुलासा करते हैं। 1976 से 2007 के बीच खूंबू ग्लेशियर औसतन करीब 18 मीटर प्रति वर्ष पीछे हटा। एवरेस्ट के तिब्बती हिस्से में रोंगबुक ग्लेशियर भी करीब 20 मीटर सालाना सिकुड़ रहा है। इसी अवधि में एवरेस्ट क्षेत्र के 15 ग्लेशियरों पर हुए अध्ययन में सभी के पीछे हटने की बात सामने आई और औसत दर करीब 28 मीटर प्रति वर्ष रही।।

पहाड़ों के तेजी से गर्म होने को वैज्ञानिक एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग कहते हैं। बर्फ की सफेद सतह सूरज की रोशनी को वापस परावर्तित करती है, लेकिन बर्फ हटते ही काली चट्टानें और पानी गर्मी सोखने लगते हैं। तापमान बढ़ता है, बर्फ और तेजी से पिघलती है और यह सिलसिला एक खतरनाक चक्र में बदल जाता है।

लक्जरी टूरिज्म, ईंधन की खपत और बढ़ती मानवीय मौजूदगी भी कारण हैं।ग्लेशियर सदियों की जमा पूंजी हैं। आज अगर यह बर्फ बेहिसाब खर्च हुई, तो कल नदियों का पानी घट सकता है। पहले बाढ़ का कहर और बाद में पानी की किल्लत हिमालय इंसान को इसी दोहरी सजा का अल्टीमेटम दे रहा है।