Bihar News : भागलपुर सिविल सर्जन आवास के पास 84 दुकानों से वसूला जा रहा मामूली किराया, सरकारी राजस्व को हो रहा भारी नुकसान
Bihar News : भागलपुर में सिविल सर्जन आवास के समीप स्थित करीब 84 सरकारी दुकानों के दशकों पुराने किराया निर्धारण को लेकर सवाल उठने लगे हैं। दशकों से इसका संशोधन नहीं किया गया है.....पढ़िए आगे
BHAGALPUR : भागलपुर में सिविल सर्जन आवास के समीप स्थित करीब 84 दुकानों के दशकों पुराने किराया निर्धारण को लेकर अब सरकारी राजस्व व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध जानकारी और संबंधित कार्यालय से की गई पड़ताल के अनुसार इन दुकानों में नीचे की दुकानों का किराया करीब 700 रुपये प्रति माह, जबकि ऊपर की दुकानों का किराया महज 500 रुपये प्रति माह निर्धारित बताया जाता है। बताया जाता है कि दुकान आवंटन के समय दशकों पूर्व प्रत्येक दुकान के लिए करीब 1 लाख रुपये एडवांस राशि सरकार के खाते में जमा कराई गई थी। पुरानी व्यवस्था के अनुसार किराये की राशि के एक हिस्से को एडवांस से समायोजित तथा शेष राशि नकद जमा किए जाने की शर्त होने की बात सामने आई है। हालांकि इन सभी बिंदुओं की वास्तविक स्थिति संबंधित सरकारी अभिलेखों की जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
पुरानी फाइल में स्वास्थ्य संबंधी दुकानों को प्राथमिकता की शर्त
मामले की पड़ताल के दौरान सिविल सर्जन कार्यालय में जानकारी ली गई। उनके अनुसार संबंधित दुकानों के आवंटन से जुड़ी पुरानी फाइल कार्यालय में उपलब्ध है। फाइल में दुकानों के आवंटन के समय स्वास्थ्य संबंधी प्रतिष्ठानों को प्राथमिकता देने की शर्त होने की बात बताई गई है। इसके अलावा स्वच्छता, अतिक्रमण सहित अन्य शर्तों का भी उल्लेख होने की जानकारी दी गई। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि वर्तमान समय में इन दुकानों में पुरानी आवंटन शर्तों के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी प्रतिष्ठानों को कितनी प्राथमिकता मिल रही है। यदि शर्तों में इसका स्पष्ट प्रावधान था तो उसके अनुपालन की स्थिति की भी समीक्षा की जानी चाहिए।
10 वर्ष में किराया रिव्यू का प्रावधान, फिर भी नहीं हुआ पुनर्निर्धारण?
मामले का सबसे अहम पहलू किराये की समीक्षा से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 10 वर्ष के अंतराल पर किराये की समीक्षा किए जाने का प्रावधान बताया जाता है। लेकिन संबंधित कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार अब तक किराये का रिव्यू नहीं हो सका है। अंजनी कुमार के अनुसार किराये की समीक्षा के लिए कार्यालय की ओर से समय-समय पर SDM सदर को लिखित पत्र भेजे जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद किराये के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सरकारी खजाना बढ़ाने पर जोर, लेकिन पुरानी दुकानों के किराये पर कब होगा मंथन?
एक तरफ सरकार विभिन्न माध्यमों से सरकारी राजस्व बढ़ाने पर लगातार जोर दे रही है। वहीं दूसरी ओर सरकारी परिसर में मौजूद इन दुकानों से दशकों पुराने और अपेक्षाकृत कम किराये की वसूली जारी रहने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि इन दुकानों के किराये का नियमानुसार समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन किया जाता तो सरकारी राजस्व में कितनी वृद्धि संभव थी। हालांकि राजस्व में वास्तविक कमी या संभावित नुकसान का आंकड़ा बिना आधिकारिक रिकॉर्ड और मूल्यांकन के बताना उचित नहीं होगा। ग्रामीण क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क के दायरे में लाने तथा सरकारी आय बढ़ाने की कवायद के बीच यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सरकारी संपत्तियों से मिलने वाले राजस्व की नियमित समीक्षा कितनी प्रभावी तरीके से हो रही है।
रिकॉर्ड की जांच से साफ होगी पूरी तस्वीर
अब जरूरत है कि संबंधित विभाग और जिला प्रशासन इन *84 दुकानों के किराया निर्धारण, एडवांस राशि, उसके समायोजन, आवंटन की शर्तों और किराया समीक्षा* से जुड़े पुराने एवं वर्तमान अभिलेखों की विधिवत जांच करें। यदि नियमों के अनुसार किराये का पुनर्निर्धारण लंबित है तो प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से सरकारी राजस्व में वृद्धि की संभावनाओं का आकलन किया जा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि दशकों पहले तय की गई शर्तों का वर्तमान समय में कितना पालन हो रहा है। फिलहाल पूरा मामला सरकारी रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के निर्णय पर निर्भर है। रिकॉर्ड की आधिकारिक समीक्षा के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन दुकानों के किराये में बदलाव की कितनी गुंजाइश है और वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को लेकर विभागीय स्तर पर आगे क्या कार्रवाई की जाती है।
बालमुकुन्द की रिपोर्ट