बांकीपुर उपचुनाव: भाजपा या प्रशांत किशोर- कम मतदान किसके लिए खतरे की घंटी, जानिए जमीनी सच

बांकीपुर उपचुनाव में असली सवाल यह है कि इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले जो 26 हजार वोट कम पड़े, वे किस वर्ग के थे? इसने सभी सियासतदानों की चिंता बढ़ा दी है

Bankipur Exit Poll
Bankipur Exit Poll- फोटो : news4nation

Bankipur Exit Poll : बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में इस बार 34.30% मतदान हुआ। कुल 3,79,616 मतदाताओं में से सिर्फ 1,30,208 लोगों ने वोट डाला। तुलना करें तो 2025 के विधानसभा चुनाव में 1,56,885 वोट पड़े थे। यानी इस बार करीब 26,677 वोट कम पड़े हैं। पहली नजर में यह कम मतदान चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन बाँकीपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यह सीट हमेशा से कम मतदान वाली रही है। 2010 से लेकर 2025 तक यहां मतदान 36 से 41 प्रतिशत के बीच ही रहा है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में 40.97 प्रतिशत, 2020 में 35.92 प्रतिशत, 2015 में 40.25 प्रतिशत और 2010 में 36.96 प्रतिशत मतदान हुआ था।


अगर पिछले चार विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड देखें तो जवाब काफी हद तक बीजेपी की ओर इशारा करता है। कम मतदान के बावजूद बीजेपी ने हर बार बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। इसकी वजह पार्टी का मजबूत और संगठित सामाजिक आधार है। कायस्थ, ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और वैश्य मतदाता लंबे समय से बीजेपी का मजबूत आधार माने जाते हैं और कम मतदान की स्थिति में भी ये अपेक्षाकृत अधिक संख्या में मतदान करते रहे हैं। लेकिन इस बार समीकरण पहले जैसे नहीं दिखे। ब्राह्मण सबसे ज्यादा पीके के साथ दिखे, राजपूत का बड़ा वोट बैंक भी टूटा। हाँ भूमिहार थोड़ा कम हुआ और कायस्थ जरूर मजबूती से भाजपाई बने रहे।


प्रशांत किशोर की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। उन्होंने बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ-साथ आरजेडी के मुस्लिम-यादव समीकरण को भी चुनौती दी। चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग का झुकाव जनसुराज की ओर दिखा, हालांकि मतदान से ठीक पहले तेजस्वी यादव के सक्रिय प्रचार के बाद कुछ मुस्लिम वोट वापस आरजेडी की ओर लौटने की चर्चा भी रही। लेकिन फायदा पीके को ही मिला। इतना ही नहीं वैश्य वर्ग से राजद उम्मीदवार होने के कारण इस जाति वर्ग के बड़ा वोट प्रतिशत भी भाजपा से टूटा है। पीके को लेकर कुर्मी जाति में भी इस बार  अलग सुगबुगाहट थी। वहीं कुशवाहा ने भाजपा के लिए मुरैठा बांध फील्डिंग की। 


चुनाव कैसे हुआ प्रभावित 

वहीं पूरे चुनाव में भाजपा का अभिषेक से नीरज को बदलना, पीके का जाति से ऊपर उठ कर विकास और पहचान के नाम पर वोट की अपील, भाजपा में हालिया समय में लिए गए संगठन और सरकार से जुड़े कुछ फैसले, तेजस्वी की उदासीनता, जेन- जी का आक्रोश, नीतीश की विदाई इन सबका असर भी पूरे चुनाव पर दिखा। बाकी एक सच पूरे चुनाव में रहा सबको अपनी जाति प्यारी। 


26 हजार कम वोट ने बढ़ाई चिंता 

ऐसी स्थिति में कम मतदान का मतलब सिर्फ बीजेपी को फायदा और विपक्ष को नुकसान मान लेना जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि जो 26 हजार वोट इस बार कम पड़े, वे किस वर्ग के थे? अगर ये वोट विपक्षी इलाकों से कम निकले हैं तो बीजेपी की स्थिति मजबूत होगी। और यही कम वोट तस्वीर बदल भी सकती है क्योंकि कम वोट देने वाले एम- वाई या अन्य जातियां नहीं थी।


एग्जिट पोल में मुकाबला दिलचस्प

चुनावी आकलनों के अनुसार पिछले चुनावों में कम मतदान के बाद भी भाजपा को मिली लगातार जीत के कारण भाजपा फिलहाल बढ़त की स्थिति में दिखाई दे रही है, लेकिन जीत का अंतर पहले की तुलना में कम हो सकता है। जन सुराज ने कायस्थ और कोयरी समुदाय को छोड़ अधिकांश सामाजिक समूहों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, जबकि भाजपा को अपने मजबूत बूथ प्रबंधन और सत्ता पक्ष होने का लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। वहीं राजद इस मुकाबले में अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में नजर आ रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 30 जुलाई को पड़े कम वोट आखिर किसके पक्ष में जाते हैं। इसका जवाब 3 अगस्त को मतगणना के साथ सामने आ जाएगा।