बांकीपुर बदलता है नेताओं की किस्मत, यहाँ से जीते दो विधायक बने बिहार के मुख्यमंत्री, एक राष्ट्रीय अध्यक्ष, 'किंगमेकर' विधानसभा दोहराएगा इतिहास

बांकीपुर विधानसभा ने बिहार को दो मुख्यमंत्री दिए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन हों या पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सबका इतिहास इस सीट से जुड़ा है, ऐसे में अब प्रशांत किशोर भी अपना लकीचार्म यहाँ आजमा रहे हैं.

Bankipur Election History
Bankipur Election History- फोटो : news4nation

Bankipur:  बिहार की राजनीति में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनका महत्व केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं रहता। पटना की बांकीपुर विधानसभा (पहले पटना पश्चिम) ऐसी ही एक सीट है। पिछले छह दशक का इतिहास गवाह है कि यहां से चुनाव जीतने वाले नेताओं का राजनीतिक कद लगातार बढ़ा है। किसी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया तो कोई राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुंच गया। यही वजह है कि 2026 का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की अगली दिशा तय करने वाला मुकाबला माना जा रहा है।


बिहार को दो मुख्यमंत्री देने वाली सीट

बांकीपुर विधानसभा ने बिहार को दो मुख्यमंत्री दिए हैं। वर्ष 1962 में इस सीट से विधायक बने कृष्ण बल्लभ सहाय बिहार के मुख्यमंत्री बने और राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए। इसके ठीक पांच वर्ष बाद 1967 में बांकीपुर ने एक और राजनीतिक इतिहास रचा। यहां से निर्वाचित महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार ने राज्य में कांग्रेस के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को समाप्त कर नई राजनीतिक धारा की शुरुआत की। आज भी बिहार में गैर-कांग्रेसी राजनीति की शुरुआत का जिक्र होता है तो बांकीपुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


ठाकुर प्रसाद से रविशंकर प्रसाद तक

1977 में जनता पार्टी की लहर के दौरान इस सीट से जनसंघ के संस्थापक नेताओं में शामिल ठाकुर प्रसाद विधायक बने। वे मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने नेतृत्व वाली बिहार सरकार में उद्योग मंत्री रहे और भाजपा की संगठनात्मक राजनीति के मजबूत स्तंभ माने गए। ठाकुर प्रसाद की राजनीतिक विरासत ने आगे चलकर उनके पुत्र रविशंकर प्रसाद को राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचाया। रविशंकर प्रसाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा बने, कई बार केंद्रीय मंत्री रहे और देश के कानून, दूरसंचार तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस राजनीतिक परिवार की मजबूती में बांकीपुर की जीत की बड़ी भूमिका रही।


निर्दलीय से मंत्री तक का सफर

1985 और 1990 में वरिष्ठ समाजवादी नेता डॉ. रामानंद यादव ने इसी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लगातार दो चुनाव जीते। बाद में वे राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और बिहार सरकार में मंत्री बने। यह उदाहरण बताता है कि बांकीपुर केवल दलों का नहीं, बल्कि मजबूत जनाधार वाले नेताओं का भी क्षेत्र रहा है।


नवीन सिन्हा से नितिन नवीन तक

1995 में भाजपा ने पहली बार इस सीट पर स्थायी राजनीतिक बढ़त बनाई। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने चुनाव जीता और लगातार चार बार विधायक बने। उनके निधन के बाद 2006 के उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। इसके बाद 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीत दर्ज करते हुए नितिन नवीन ने बांकीपुर को भाजपा का अभेद्य गढ़ बनाए रखा। 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 51,936 मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की। इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया और वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। इस तरह बांकीपुर ने एक बार फिर साबित किया कि यहां की जीत केवल विधायक बनने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बड़े राजनीतिक दायित्वों का रास्ता भी खोलती है।


अब प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी परीक्षा

अब इसी ऐतिहासिक सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। वर्षों से वे बिहार की राजनीति में परिवर्तन और मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा खुलकर व्यक्त करते रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर है कि क्या बांकीपुर का इतिहास उनके लिए भी नई राजनीतिक दिशा लिखेगा या नहीं। दूसरी ओर भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल ने भी रेखा गुप्ता को पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतारा है। तीन प्रमुख दलों की मौजूदगी ने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है।


क्यों सबसे खास है यह उपचुनाव?

बांकीपुर का इतिहास बताता है कि यहां से जीतने वाला नेता अक्सर बिहार की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाता है। इस सीट ने दो मुख्यमंत्री दिए, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को मजबूत किया, केंद्रीय मंत्री का राजनीतिक आधार तैयार किया और कई बड़े नेताओं के कद को नई ऊंचाई दी।


यही वजह है कि 2026 का बांकीपुर उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं माना जा रहा। यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा है कि बिहार की राजनीति का अगला बड़ा चेहरा कौन होगा। अगर इतिहास भविष्य की दिशा तय करने का संकेत देता है, तो बांकीपुर की जनता इस बार भी किसी ऐसे नेता का राजनीतिक भविष्य लिख सकती है, जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी सुनाई दे।