Bihar Jobs Scheme: बिहार में खिलाड़ियों की बल्ले-बल्ले! मेडल लाओ, नौकरी पाओ योजना से 2 साल में 181 को सरकारी नौकरी, बेटियों ने भी गाड़े कामयाबी के झंडे

Bihar Jobs Scheme: बिहार में खेल के मैदान पर मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता खुल रहा है। ...

Bihar Jobs Scheme
दरोगा से DSP तक बने खिलाड़ी- फोटो : X

Bihar Jobs Scheme: बिहार में खेल के मैदान पर मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता खुल रहा है। राज्य सरकार की ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना ने पिछले दो वर्षों में 181 खिलाड़ियों को सरकारी सेवा से जोड़कर खेल और रोजगार के बीच मजबूत रिश्ता कायम किया है। इन खिलाड़ियों में 86 महिलाएं और 95 पुरुष शामिल हैं। यानी नौकरी पाने वालों में करीब आधी हिस्सेदारी महिला खिलाड़ियों की है। यह आंकड़ा बताता है कि बिहार की बेटियां अब खेल के मैदान में पदक जीतने के साथ अपने पैरों पर खड़े होने और परिवार का भविष्य संवारने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।

मेडल जीतने पर सरकारी नौकरी, खिलाड़ियों को मिल रहा सम्मान

‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना का मकसद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को उनकी उपलब्धियों के अनुरूप सरकारी सेवा में अवसर देना है। इसके तहत निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर खिलाड़ियों की नियुक्ति विभिन्न सरकारी पदों पर की जाती है। इनमें पुलिस अवर निरीक्षक यानी दरोगा, पुलिस उपाधीक्षक (DSP), पंचायती राज पदाधिकारी और अन्य पद शामिल हैं।सरकारी नौकरी मिलने से खिलाड़ियों को आर्थिक सुरक्षा के साथ अपने खेल करियर को आगे बढ़ाने का भरोसा भी मिलता है। इससे उन युवाओं और युवतियों को प्रोत्साहन मिलता है, जो खेल में बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन भविष्य और रोजगार की चिंता के कारण पीछे हट जाते हैं।भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज आकाश दीप और मुकेश कुमार को भी उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर पुलिस उपाधीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया है। ऐसे उदाहरण खेल को करियर के रूप में अपनाने वाले युवाओं के लिए प्रेरणा का काम करते हैं।

सपना कुमारी ने संघर्ष को बनाया कामयाबी की सीढ़ी

रग्बी खिलाड़ी सपना कुमारी की कहानी संघर्ष, हौसले और सफलता की मिसाल है। उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में खेल के दौरान उन्हें सामाजिक विरोध और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। गांव में शॉर्ट्स पहनकर खेलने पर लोग ताने कसते थे, लेकिन उनकी मां ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया।सपना ने अपनी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। वर्ष 2022 में पाटलिपुत्र खेल परिसर में आयोजित प्रतियोगिता में तीन स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिली। वर्तमान में वह बिहार राज्य खेल प्राधिकरण में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं।सपना के मुताबिक, नौकरी मिलने के बाद उनके गांव और समाज का नजरिया बदला है। अब लोग अपनी बेटियों को भी खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनकी कहानी बताती है कि परिवार का साथ और लगातार मेहनत सामाजिक बंदिशों को पीछे छोड़ सकती है।

श्यामारानी ने आलोचनाओं के बीच बनाई पहचान

मुंगेर जिले के इटहरी गांव की फुटबॉल खिलाड़ी श्यामारानी ने वर्ष 2008 में अपनी खेल यात्रा शुरू की थी। शुरुआती दौर में उन्हें सामाजिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन परिवार के सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।श्यामारानी भारतीय महिला फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और इंडियन विमेंस लीग में पंजाब एफसी की कप्तानी भी संभाल चुकी हैं। फिलहाल वह खेल कोटे के तहत सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं और बिहार राज्य खेल प्राधिकरण की खेल गतिविधियों में योगदान दे रही हैं।उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं, बेहतर प्रशिक्षण और खेल क्लबों की उपलब्धता से लड़कियों के लिए आगे बढ़ने के अवसर बढ़े हैं। खेल के प्रति बदलता नजरिया नई पीढ़ी की महिला खिलाड़ियों के लिए उम्मीद की नई राह खोल रहा है।

कोमल कुमारी बोलीं-खिलाड़ियों को मिल रही बेहतर सुविधाएं

बिहार राज्य खेल प्राधिकरण की एथलेटिक्स कोच कोमल कुमारी ने बताया कि पहले राज्य में खेल की आधारभूत संरचना और सरकारी सहयोग की कमी खिलाड़ियों के सामने बड़ी चुनौती थी। अब खेल विभाग और बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के सहयोग से खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं।उन्होंने बताया कि प्रेरणा, सक्षम और उत्कर्ष जैसी योजनाओं के तहत पात्र खिलाड़ियों को तीन लाख से 20 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। इससे प्रशिक्षण, डाइट और शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।

बेटियों के लिए खेल बन रहा करियर का मजबूत विकल्प

‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना से जुड़े आंकड़े और महिला खिलाड़ियों के अनुभव इस बात को रेखांकित करते हैं कि खेल अब केवल शौक या पदक जीतने तक सीमित नहीं रह गया है। सही प्रशिक्षण, परिवार का सहयोग और रोजगार के अवसर मिलने पर खिलाड़ी खेल के जरिए अपना भविष्य संवार सकते हैं।बिहार में पिछले दो वर्षों के दौरान 181 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी मिलना इस दिशा में अहम उपलब्धि है। अब चुनौती यह है कि ज्यादा से ज्यादा प्रतिभाशाली खिलाड़ियों तक प्रशिक्षण, सुविधाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचे, ताकि गांव-कस्बों से निकलने वाली प्रतिभाएं भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना सकें।

हीरेश कुमार