पटना इस्कॉन मंदिर में धूमधाम से मना देव पूर्णिमा: सहस्र जल से हुआ महाप्रभु का महाभिषेक
Patna : राजधानी पटना के बुद्ध मार्ग स्थित इस्कॉन (ISKCON) मंदिर में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के पावन अवसर पर भव्य श्री जगन्नाथ स्नान उत्सव का आयोजन किया गया। इस धार्मिक उत्सव की शुरुआत 'हरे कृष्णा हरे कृष्णा...' के मधुर और दिव्य स्वागत कीर्तन से हुई, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय हो उठा। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान जगन्नाथ का पंचगव्य और सहस्र जल (हजारों कलशों के पवित्र जल) से भव्य महाअभिषेक संपन्न कराया गया।
छप्पन भोग अर्पित, महाआरती के बाद बंटा महाप्रसाद
महाअभिषेक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को श्रद्धापूर्वक छप्पन भोग अर्पित किया गया। इसके उपरांत, भक्तों के लिए बहुप्रतीक्षित 'गजावेश' (हाथी रूप) दर्शन की खिड़की खोली गई, जिसे देखकर उपस्थित श्रद्धालु निहाल हो उठे। भगवान के इस दिव्य रूप की भव्य महाआरती उतारी गई और पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद मंदिर में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं और आम लोगों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया।
इसी पावन तिथि पर प्रकट हुए थे स्वयं भगवान जगन्नाथ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास की इस पूर्णिमा को 'देव पूर्णिमा' या 'स्नान पूर्णिमा' भी कहा जाता है, जिसका सनातन धर्म और विशेष रूप से जगन्नाथ संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों में ऐसी दृढ़ मान्यता है कि इसी पावन तिथि के दिन स्वयं जाग्रत देव भगवान जगन्नाथ, अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ धरती पर प्रकट हुए थे। यही कारण है कि इस दिन को उनकी प्राकट्य स्थली और देश-विदेश के जगन्नाथ मंदिरों में बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
स्नान यात्रा के बाद 15 दिनों के लिए बीमार (अनासर काल) होंगे महाप्रभु
उत्सव के दौरान जगन्नाथ जी के कथा प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए इस्कॉन टीएमसी के को-चेयरमैन रमन मनोहर दास ने बताया कि जब राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार दारुब्रह्म (काष्ठ स्वरूप) के रूप में भगवान जगन्नाथ को स्थापित किया था, तब ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही उनका पहला विशाल स्नान उत्सव आयोजित हुआ था। उन्होंने इसके पीछे का गहरा रहस्य बताते हुए कहा कि इस भव्य स्नान के बाद अत्यधिक ठंडे जल से स्नान करने के कारण भगवान बीमार हो जाते हैं, जिसे 'अनासर काल' कहा जाता है। अगले 15 दिनों तक भगवान को एकांत कक्ष (औषधालय) में रखा जाएगा, जहाँ उन्हें विशेष जड़ी-बूटियों का काढ़ा और सात्विक भोग लगाया जाएगा। इसके बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान अपनी प्रसिद्ध रथयात्रा पर निकलेंगे।
भक्त गणपति भट्ट की मनोकामना के बाद शुरू हुई गजावेश की परंपरा
गजावेश की परंपरा के बारे में टीएमसी के सदस्य राधापति चरण दास ने बताया कि एक बार भगवान के परम भक्त और गणेश जी के उपासक गणपति भट्ट पुरी आए थे। वे भगवान जगन्नाथ में अपने इष्ट देव गणेश जी का रूप देखना चाहते थे। भक्त की इस मनोकामना को पूर्ण करने के लिए महाप्रभु ने इसी स्नान पूर्णिमा के दिन उन्हें हाथी के मुख (गणेश रूप) में दर्शन दिए थे और तब से आज तक स्नान यात्रा के दिन भगवान को गजावेश में सजाने की अनूठी परंपरा चली आ रही है। इस्कॉन पटना के कम्युनिकेशन हेड नंदगोपाल दास के अनुसार, इस पावन अवसर पर टीएमसी के सदस्य वेणू विनोददास सहित मंदिर के कई आजीवन सदस्य व भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
वंदना की रिपोर्ट