चिराग पासवान पर खूब बरसे संतोष सुमन, मांझी पिता-पुत्र ने मंत्री पद छोड़ने की चुनौती स्वीकारी, NDA में भिड़ंत

संतोष सुमन ने कहा, हमारा सवाल किसी जाति या समुदाय का हक छीनने का नहीं है। सवाल उन लोगों का है जो आज भी उसी आरक्षित वर्ग की कतार में सबसे पीछे खड़े हैं। इसी को लेकर उन्होंने चिराग पासवान को घेरा है

 Santosh Suman
Santosh Suman- फोटो : news4nation

Bihar News : बिहार में आरक्षण की समीक्षा को लेकर एनडीए के दो घटक दलों में एक दूसरे का इस्तीफा मांगने की बातें तेज हो गई हैं। इसी क्रम में बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन ने चिराग पासवान को बड़ी चुनौती दी है। चिराग पासवान ने कहा था कि अगर मांझी पिता-पुत्र को आरक्षण में क्रीमी लेयर चाहिए तो पहले जीतन राम मांझी और संतोष सुमन को मंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इसी पर अब संतोष सुमन ने उसी तरह चिराग पासवान पर पलटवार किया है। 


संतोष सुमन ने कहा, जहाँ तक इस्तीफे का सवाल है, हम तैयार हैं। मेरे छोटे भाई की पार्टी बड़ी है, उनके पास हमसे अधिक संख्याबल है और राजनीतिक रूप से तीसरी पीढ़ी भी है—तो शुरुआत वही करें। वे इस्तीफा देकर सामने आएँ, हम भी उनके साथ इस्तीफा देने को तैयार हैं। लेकिन मेरे छोटे भाई, पहले मेरी बात को ठीक से समझिए। मैंने अपने ट्वीट और बयान में कहीं भी क्रीमी लेयर की बात नहीं की है। मैंने न SC/ST आरक्षण समाप्त करने की बात कही है और न ही क्रीमी लेयर के आधार पर किसी को आरक्षण से बाहर करने की बात कही है। कोटे में कोटा और क्रीमी लेयर—दोनों पूरब और पश्चिम हैं। दोनों को एक साथ मिलाकर जनता को भ्रमित करना उचित नहीं है। यदि क्रीमी लेयर की बात आएगी तो उसके अपने अलग परिणाम होंगे, लेकिन हम जिस विषय की बात कर रहे हैं, वह SC/ST के भीतर वर्गीकरण और कोटे में कोटा है। इसलिए मेरा आग्रह है कि मेरे ट्वीट को शब्दशः पढ़िए, सच्चाई और हकीकत को आत्मसात करिए और फिर अपनी बात रखिए।


उन्होंने कहा, हमारा सवाल किसी जाति या समुदाय का हक छीनने का नहीं है। सवाल उन लोगों का है जो आज भी उसी आरक्षित वर्ग की कतार में सबसे पीछे खड़े हैं। मुसहर, भुइयाँ, हलखोर, नट, डोम और ऐसे अनेक समुदाय आज भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े हैं। विडंबना यह है कि कई जगह उन्हें अपने ही वर्ग के भीतर सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अगर एक ही वर्ग में कुछ लोग लगातार आगे बढ़ते जाएँ और कुछ लोग पिछले 80 वर्षों से भी कतार में पीछे खड़े रहें, तो उनकी सुध कौन लेगा? हम आगे बढ़ चुके लोगों का आरक्षण खत्म करने की बात नहीं कर रहे हैं। 


उन्होंने कहा, हम कह रहे हैं—उन्हें उनका हिस्सा मिलता रहे और जो पीछे हैं, उनके लिए भी थोड़ा हिस्सा सुनिश्चित किया जाए। दस भाइयों के घर में अगर चार बड़े भाई सारी थाली अपने सामने खींच लें और बाकी छह भाई मुँह ताकते रह जाएँ, तो क्या पिता से यह पूछना गलत है कि बाकी भाइयों की बारी कब आएगी? मिल-बाँटकर खाने और सबको साथ लेकर चलने में जो खुशी और न्याय है, वह अकेले-अकेले खाने में नहीं है।


संतोष सुमन ने कहा, हम यह भी कहना चाहते हैं कि इस विषय पर डर, आशंका और भ्रम की भाषा के बजाय संवाद और तथ्यों की भाषा में बात होनी चाहिए। जब मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू हुई थीं, तब भी तरह-तरह की आशंकाएँ व्यक्त की गई थीं और कहा गया था कि इससे समाज में बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाएगा। लेकिन समय के साथ सामाजिक न्याय की उस व्यवस्था ने भारतीय लोकतंत्र में अपनी जगह बनाई। इसलिए आज भी जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इस विषय पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। असहमति लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन किसी के अधिकार और हिस्सेदारी की मांग को ही गलत ठहरा देना उचित नहीं है। SC/ST समाज के भीतर भी किसी को सामंती सोच के साथ बात नहीं करनी चाहिए। कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं—हर गरीब की लड़ाई हमारी लड़ाई है, हर वंचित की आवाज हमारी आवाज है।

उन्होंने कहा, इसलिए ऐसे लोगों से कहना चाहेंगे कि कभी राजनीतिक मंचों और बयानबाजी से बाहर निकलकर उन गरीबों की झोपड़ियों और मलीन बस्तियों में जाकर देखिए, जहाँ सूरज की किरण तो पहुँचती है, लेकिन सरकारी योजनाओं, शिक्षा, अवसर और आरक्षण के लाभ की किरण आज भी पूरी तरह नहीं पहुँच पाई है। वहाँ जाकर उन परिवारों से पूछिए कि वे किस हाल में जी रहे हैं। तब शायद उस दर्द और संवेदना को समझ पाएँगे, जिसकी बात हम कर रहे हैं। हम किसी के खिलाफ नहीं हैं; हम सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के पक्ष में हैं। इसलिए राजनीतिक रोटी कौन सेंक रहा है, यह जनता बहुत अच्छी तरह समझती है। 


संतोष ने कहा, हम तो चाहते हैं कि आंकड़ों के आधार पर समीक्षा हो, वास्तविक स्थिति सामने आए और ऐसी व्यवस्था बने जिससे जो लोग दशकों से पीछे रह गए हैं, उन्हें भी आगे आने का अवसर मिले। मेरे छोटे भाई, मेरी बात का विरोध करने से पहले मेरी बात को पूरा पढ़िए, समझिए और फिर जवाब दीजिए। जनता को भ्रमित मत करिए। सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं कि व्यवस्था जैसी है, वैसी ही हमेशा बनी रहे; सामाजिक न्याय का अर्थ है—जो सबसे पीछे है, उसे भी आगे आने का रास्ता मिले, सम्मान मिले और उसका उचित हिस्सा मिले।