Bihar News : अव्वल दर्जे के उद्दंड हैं कुंदन कृष्णन...पांच करोड़ की नोटिस भेजे जाने के बाद भड़के राजद सांसद सुधाकर सिंह, मुख्यमंत्री को लिखा खुला पत्र

Bihar News : वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन द्वारा राजद सांसद सुधाकर सिंह को 5 करोड़ रुपये का मानहानि का नोटिस भेजे जाने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है. सांसद ने सीएम के नाम खुला पत्र लिखा है.....पढ़िए आगे

Bihar News : अव्वल दर्जे के उद्दंड हैं कुंदन कृष्णन...पांच क
सीएम के नाम खुला पत्र - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : बिहार सरकार के पुलिस अधिकारी कुंदन कृष्णन के द्वारा मानहानि का नोटिस भेजे जाने के बाद राजद सांसद सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को खुला पत्र लिखा है। जिसमें  उन्होंने लिखा है की आपको पता चला ही होगा कि बिहार सरकार के एक मुलाजिम कुंदन कृष्णन ने मुझे 5 करोड़ रुपये की मानहानि का हास्यास्पद नोटिस भेजा है। हालाँकि, उनसे पूछिएगा कि 5 करोड़ रुपये की राशि किस आधार पर तय की गई है; कहीं बिग बॉस या राइज एंड फॉल जैसे किसी रियलिटी शो में तो नहीं जाने वाले थे, जिसमें जाने का अवसर मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद नहीं मिल पाया। चूँकि मेरे द्वारा उठाए गए सवाल और लगाए गए आरोप बिहार सरकार के एक अधिकारी तथा सरकारी पद पर आसीन व्यक्ति की भूमिका से संबंधित थे, इसलिए मैं यह भी जानना चाहूँगा कि बिहार सरकार इस नोटिस से कितनी सहमत है। केंद्र सरकार के All India Services Conduct Rules, 1968 और बिहार सरकार के Bihar Government Servant’s Conduct Rules, 1976 के अनुसार किसी भी सरकारी अधिकारी को सरकारी काम से संबंधित मामले में किसी के ऊपर मानहानि का दावा करने के पहले निर्धारित प्रावधानों के अधीन सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। कृपया स्पष्ट करें कि क्या राज्य के गृह मंत्री के तौर पर आपके द्वारा या आपकी सरकार द्वारा इसकी अनुमति दी गई है? और अगर इस मामले में सरकारी अनुमति नहीं ली गई है, तो कृपया इन महाशय को सरकारी नियमावली की ट्रेनिंग दिलवाने का कष्ट करें।

उन्होंने लिखा की हालाँकि, मुझे इस नोटिस को देखकर ज़्यादा हैरानी नहीं हुई। पिछले बीस सालों में बिहार सरकार के अधिकांश IAS और IPS अधिकारी भूल गए हैं कि वे जनता के नौकर हैं और चुने हुए विधायक तथा सांसद जनता के प्रतिनिधि। जब नौकर को भ्रम हो जाता है कि वही हुक्मरान है, तो वह जनता से दुर्व्यवहार करता है और जनप्रतिनिधि से सवाल; जो आजकल बिहार में हो रहा है। वर्तमान में बिहार सरकार के अधिकारियों की कार्यशैली, अहंकार और उनके ज़रूरत से ज़्यादा विशेषाधिकारों को देखकर यही लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब कोई अधिकारी किसी मंत्री द्वारा की गई आलोचना से नाराज़ होकर उलटे मंत्री को माफ़ीनामा लिखने के लिए नोटिस थमा देगा। अधिकारियों द्वारा पक्ष और विपक्ष के विधायकों की अनदेखी तो सामान्य हो ही गई है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब आप स्वयं नगर विकास मंत्री थे, तो उस समय के तत्कालीन पटना नगर आयुक्त कुलदीप नारायण के द्वारा आपसे अभद्रतापूर्वक व्यवहार के चलते तत्कालीन सरकार को कुलदीप नारायण का निलंबन करना पड़ा था। ऐसा नहीं है कि कुंदन कृष्णन पहली बार ऐसा कर रहे हैं। डेढ़ साल पहले भी दीपक कुमार के भ्रष्टाचार के संबंध में जब मैं प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा था, तो स्वयं कुंदन कृष्णन द्वारा अपने मातहत डीएसपी के ज़रिए मुझे और मेरे भाई को परिणाम भुगत लेने की धमकी दी गई थी। इस बात की सूचना मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से स्वयं मिलकर लिखित में दी थी।

लिखा की कुंदन कृष्णन कितने अव्वल दर्जे के उद्दंड हैं, इस बात से समझा जा सकता है कि बिहार में बढ़ते अपराध के बारे में इन्होंने कहा था कि जब बिहार में खेती का समय नहीं होता है, तो किसान अपराध में शामिल रहते हैं। उस समय आप बिहार के गृह मंत्री थे। इस शर्मनाक बयान के बाद आप सहित पूरी सरकार की बदनामी हुई थी। किसानों के द्वारा हंगामा और आलोचना बढ़ते देख कुंदन कृष्णन के द्वारा सार्वजनिक माफ़ी माँगी गई थी। ये तमाम उदाहरण पर्याप्त हैं यह बताने के लिए कि कुंदन कृष्णन किस मानसिकता से ग्रसित हैं। किसी राज्य की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि पक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधि लगातार कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्यों और लिए गए निर्णयों की समीक्षा करते रहें। अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो जनता के ये नौकर सरकारी धन-संपदा लूटने लगेंगे और पूरी तरह बेलगाम हो जाएँगे। भरत तिवारी वाले मामले में आप और बिहार सरकार द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि पुलिस से भूल हुई है। इसी आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया, मृतक की माता की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज हुई और सरकार ने न्यायिक जाँच का आदेश दिया। जिस समय भारत भूषण तिवारी की हत्या हुई, उस समय कुंदन कृष्णन बिहार एसटीएफ के डीजी के पद पर कार्यरत थे। हत्या के दिन की कमान, निर्णय प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों के बीच हुए संवाद और पुलिस मुख्यालय की भूमिका जाँच के घेरे में हैं। इस आधार पर कुंदन कृष्णन की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सुधाकर सिंह ने लिखा की एक सांसद के तौर पर यह मेरी जवाबदेही है कि मैं किसी दुर्घटना के बाद सार्वजनिक तौर पर अधिकारियों की कार्यशैली और भूमिका पर सवाल उठाऊँ। मुझे मानहानि का नोटिस भेजकर वे स्वयं को जाँच के घेरे से बाहर दिखाना चाहते हैं, जो प्रशासनिक सीमाओं के उल्लंघन को भी दर्शाता है। चूँकि आप भी एक जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए उम्मीद करता हूँ कि आप इस बात को समझेंगे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका का विधायिका के द्वारा निर्देशित होना कितना ज़रूरी है। संविधान सर्वोपरि है। अगर कार्यपालिका अपनी सीमाओं को लाँघते हुए मुख्यमंत्री से सवाल कर दे या नोटिस भेज दे, तो राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाएगा। अंत में आपसे एक आग्रह करूँगा कि राज्य के सभी जिलों के DM और SP को निर्देशित करें कि वे अपने कार्यालयों में राजा की तरह जनता से 20 फुट की दूरी पर बैठकर दरबार लगाना बंद करें। वे जनता के नौकर हैं; आम लोगों के साथ संवेदनशील और मानवीय व्यवहार करें। ऐसा करेंगे, तो वे कुंदन कृष्णन जैसा अधिकारी बनने से बच जाएँगे। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना हम सबकी जवाबदेही है, इसलिए मैं समय-समय पर उद्दंड अधिकारियों को आईना दिखाता रहूँगा।