शिवानंद तिवारी ने लिखा भावुक पोस्ट.....अंतिम यात्रा........मेरा दाह संस्कार ....जमशेदपुर में हो....

चुनावी राजनीति के गवाह और सिद्धांतों पर जीने वाले 83 वर्षीय शिवानन्द जी ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर एक बेहद भावुक संस्मरण साझा किया है। उन्होंने लिखा है उम्र के इस मोड़ पर अब यह अहसास स्वाभाविक है कि जीवन का समय धीरे-धीरे अपनी समाप्ति की ओर बढ़..

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शिवानंद तिवारी - फोटो : सोशल मीडिया

Patna : चुनावी राजनीति के गवाह और सिद्धांतों पर जीने वाले 83 वर्षीय शिवानन्द जी ने अपने जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक संस्मरण साझा किया है। 9 दिसंबर 1943 को जन्मे शिवानन्द जी अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि जैसे गांव में तेल खत्म होने पर लालटेन की लौ टिमटिमाने लगती थी, वैसे ही आज उन्हें अपना जीवन महसूस हो रहा है। वे खुलकर स्वीकार करते हैं कि उम्र के इस मोड़ पर अब यह अहसास स्वाभाविक है कि जीवन का समय धीरे-धीरे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।


जमशेदपुर में अपनों का साथ और स्वास्थ्य की चुनौतियां

शिवानन्द जी इन दिनों जमशेदपुर में अपने बड़े बेटे और बहू के साथ रह रहे हैं, जहां उन्हें परिवार का भरपूर स्नेह और सेवा-सुख मिल रहा है। हालांकि, शरीर के गिरते स्तर को देखते हुए वे जानते हैं कि यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चलेगा। हाल ही में उन्हें जमशेदपुर के टाटा मेन अस्पताल (टीएमएच) में दो बार भर्ती होना पड़ा। छोटे बेटे मंटू ने उन्हें बेहतर चिकित्सा के लिए पास बुलाने का आग्रह भी किया, लेकिन शिवानन्द जी का मानना है कि इलाज किसी को अमर नहीं बना सकता; इंसान बस यही चाहता है कि उसका अंत कष्टदायक न हो।


पटना की 'कैद' बनाम जमशेदपुर में प्रकृति का सहारा

जमशेदपुर में अपने बेटे के घर की खिड़की से खरकई नदी, दूर तक फैले जंगल और सड़कों पर दौड़ते वाहनों को देखकर वे जीवन की गतिशीलता को महसूस करते हैं। तुलना करते हुए वे कहते हैं कि पटना का उनका वर्तमान आवास उन्हें एक कैद की तरह लगता है, जबकि यहां कम से कम प्रकृति और जीवन की हलचल करीब से दिखाई देती है। इसी बीच वे आधुनिक दौर की इस समस्या पर भी चिंता जताते हैं कि आज समाज में बुजुर्गों के लिए समय घटता जा रहा है और आत्मीयता की जगह केवल औपचारिकताएं लेती जा रही हैं।


पोती के विवाह की इच्छा और आत्मकथा से इनकार

शिवानन्द जी की अब जीवन से कोई विशेष अपेक्षा नहीं है, सिवाय इसके कि वे जनवरी में होने वाली अपनी बड़ी पोती की शादी अपनी आँखों से देख सकें। समाजवाद और चुनावी राजनीति में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके शिवानन्द जी ने अपनी आत्मकथा लिखने से साफ इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वे कोई इतने बड़े व्यक्ति नहीं हैं जिससे इतिहास बदल जाए। सार्वजनिक जीवन में जो कुछ भी हुआ, वह जनता के सामने है; ऐसे में किसी की प्रशंसा या आलोचना करने का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।


1942 के आंदोलन की यादें और अंतिम विदा की इच्छा

जमशेदपुर शहर से शिवानन्द जी के परिवार का बहुत पुराना और ऐतिहासिक नाता है। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके बाबूजी ने इसी शहर के बिष्टुपुर की सड़कों पर गांधी टोपी पहनकर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए थे, जिसके बाद उन्हें हजारीबाग जेल भेजा गया था, जहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) से उनकी मुलाकात हुई थी। अपनी इसी समृद्ध विरासत के कारण शिवानन्द जी ने इच्छा जताई है कि यदि अंतिम समय आए, तो उनका दाह-संस्कार भी जमशेदपुर के ही विद्युत शवदाह गृह में शांतिपूर्वक किया जाए।