जमीन रजिस्ट्री का 'नया डिजिटल युग': बिहार में 1 अप्रैल से बदल जाएंगे जमीन खरीद-बिक्री के नियम
एक और महत्वपूर्ण बदलाव पुलिस की भूमिका को लेकर भी किया गया है. अब पुलिस सीधे जाकर जमीन पर कब्जा दिलाने या विवाद में हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी. इसके लिए अंचल अधिकारी (CO) को पहले जानकारी देना अनिवार्य होगा.
बिहार सरकार राज्य में जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर 1 अप्रैल 2026 से एक नई और सख्त व्यवस्था लागू करने जा रही है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य जमीन के कारोबार में होने वाले फर्जीवाड़े को रोकना और 'खोसला का घोसला' जैसे हालात, यानी अवैध कब्जों पर लगाम लगाना है। नई नियमावली के तहत अब पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाएगा ताकि आम आदमी धोखाधड़ी का शिकार न हो।
पुलिस की मनमानी पर लगा 'सीओ' का पहरा
नये नियमों के तहत जमीन विवादों में पुलिस की भूमिका को सीमित और जवाबदेह बना दिया गया है। अब पुलिस सीधे किसी जमीन पर जाकर कब्जा दिलाने या हस्तक्षेप करने की हकदार नहीं होगी। किसी भी विवादित स्थल पर जाने से पहले पुलिस को संबंधित अंचल अधिकारी (CO) को सूचना देना अनिवार्य होगा। बिना राजस्व अधिकारियों के संज्ञान के पुलिस की दखलअंदाजी को अवैध माना जाएगा और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी।
पोर्टल पर 13 सवालों का देना होगा जवाब
जमीन रजिस्ट्री की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए ई-निबंधन पोर्टल पर 13 तरह की जानकारियां भरना अनिवार्य कर दिया गया है। खरीदार और विक्रेता को अब खाता संख्या, खेसरा, रकबा, चौहद्दी और जमाबंदी जैसी विस्तृत जानकारी पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। सरकार का मानना है कि अधूरी जानकारी ही भविष्य में बड़े कानूनी विवादों की जड़ बनती है, जिसे इस अनिवार्य डेटा फीडिंग से रोका जा सकेगा।
सेटेलाइट तस्वीरों से होगी जमीन की सटीक पहचान
तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए अब जमीन, मकान या फ्लैट की रजिस्ट्री के समय उसकी सेटेलाइट तस्वीर अपलोड करना अनिवार्य होगा। इस प्रणाली में अक्षांश और देशांतर ($Latitude-Longitude$) का उपयोग किया जाएगा, जिससे जमीन की सटीक लोकेशन दर्ज हो सकेगी। जब तक संपत्ति की वास्तविक तस्वीर पोर्टल पर नहीं दिखेगी, तब तक रजिस्ट्री के लिए स्लॉट बुक नहीं किया जा सकेगा।
भू-माफियाओं की पहचान और सख्त सजा का प्रावधान
राज्य सरकार ने भू-माफियाओं के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। प्रत्येक अंचल में चिन्हित कुख्यात भू-माफियाओं पर सीधे FIR दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं। फर्जी दस्तावेज बनाकर जमीन हड़पने के मामलों में अब 7 से 10 साल तक की जेल हो सकती है। प्रशासन का लक्ष्य ऐसे तत्वों की सूची बनाकर उन्हें कानूनी शिकंजे में कसना है जो जानबूझकर जमीनों को विवादित बनाते हैं।
जांच के लिए 10 दिनों का 'डेडलाइन' फॉर्मूला
नियमों में एक राहतकारी प्रावधान यह भी है कि आवेदक अपनी दी गई जानकारी की सरकारी स्तर पर जांच करा सकता है। पोर्टल पर जानकारी दर्ज होने के बाद संबंधित अंचल अधिकारी को 10 दिनों के भीतर सत्यापन करना होगा। यदि अधिकारी इस समय सीमा में जवाब नहीं देते हैं, तो सिस्टम स्वतः मान लेगा कि आवेदक द्वारा दी गई जानकारी सही है और रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी जाएगी।
पारदर्शिता से कम होंगे अदालती मामले
इन व्यापक बदलावों का दूरगामी परिणाम जमीन विवादों में कमी के रूप में देखा जा रहा है। सेटेलाइट मैपिंग और डिजिटल सत्यापन से एक ही जमीन को बार-बार बेचने की धोखाधड़ी खत्म होगी। यह नई व्यवस्था न केवल निवेश को सुरक्षित बनाएगी, बल्कि सालों-साल चलने वाले अदालती मुकदमों के बोझ को भी कम करेगी, जिससे बिहार के राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली में बड़ा सुधार आएगा।