Bihar Pension Fraud: साहेब हम जिंदा हैं...तकनीकी खामी से पेंशन बंद होने से लाखों पेंशनधारियों की सांसें अटकीं, दफ्तर-दफ्तर चक्कर काट कर घिस गईं हैं चप्पल
Bihar Pension Fraud: लाखों पेंशनधारियों को मृत की सूची में शामिल कर उनकी पेंशन रोक दी गई है।....
Bihar Pension Fraud: बिहार में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत पेंशन पाने वाले लाखों जरूरतमंद आज एक अजीबो-गरीब हालात से दो-चार हैं। जीवन प्रमाणीकरण न होने के कारण हजारों नहीं, बल्कि लाखों पेंशनधारियों को मृत की सूची में शामिल कर उनकी पेंशन रोक दी गई है। नतीजा यह कि वृद्ध, विधवा और दिव्यांग पेंशनधारी अब खुद को जिंदा साबित करने की जद्दोजहद में दफ्तर-दफ्तर भटकने को मजबूर हैं।
सामाजिक सुरक्षा निदेशालय की सचिव वंदना प्रेयसी की समीक्षा रिपोर्ट ने तस्वीर साफ कर दी है। सूबे में कुल 1.24 करोड़ पेंशनधारी हैं, जिनमें से 82.61 लाख का जीवन प्रमाणीकरण हो सका है, जबकि 41.65 लाख का प्रमाणीकरण अब तक अधूरा है। हैरत की बात यह है कि फैसिलिटेशन सेंटर पर नि:शुल्क जीवन प्रमाणीकरण के स्पष्ट हुक्म के बावजूद इतनी बड़ी तादाद में लाभार्थी इस प्रक्रिया से वंचित रह गए। सचिव ने तमाम जिलाधिकारियों को दिलचस्पी लेकर अभियान चलाने और काम जल्द मुकम्मल कराने का निर्देश दिया है।
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पटना में 2.22 लाख, पूर्वी चंपारण में 2.6 लाख, गया में 1.77 लाख, दरभंगा में 1.67 लाख, मधुबनी में 1.85 लाख, समस्तीपुर में 1.57 लाख और सारण में 1.59 लाख पेंशनधारियों का जीवन प्रमाणीकरण अटका है। मुजफ्फरपुर में 1.97 लाख, गोपालगंज में 1.32 लाख, सीवान में 1.59 लाख, पूर्णिया में 1.41 लाख और अररिया में 1.33 लाख लोग इस संकट से जूझ रहे हैं। छोटे जिलों में भी हाल बेहतर नहीं शेखपुरा में 30,734, शिवहर में 27,314 और अरवल में 21,762 पेंशनधारियों का प्रमाणीकरण अधर में है।
जमीनी हकीकत और भी दर्दनाक है। मुजफ्फरपुर कुढ़नी के केरमा डीह निवासी शंकर साह, जो चार साल से वृद्धावस्था पेंशन पा रहे थे, चार माह पहले ‘मृत’ घोषित कर दिए गए। मुखिया, सरपंच और बीडीओ के सामने पेश होने के बाद भी समाधान नहीं निकला। कॉमन फैसिलिटेशन सेंटर पर दो-दो बार आवेदन के बावजूद नाम मृतकों की फेहरिस्त से नहीं हटा।
दरियापुर कफेन गांव के सत्यनारायण राय की दास्तान भी कम तकलीफदेह नहीं। सितंबर से पेंशन बंद है, वजह उन्हें कागजों में मृत’ बता दिया गया। रुंधे गले से वे कहते हैं, “पेंशन ही सहारा है, उसे भी बंद कर दिया गया।सवाल उठता है जब जिंदा लोग अपने वजूद का सबूत देने पर मजबूर हों, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?