AK-47 फायरिंग पर छात्रों का गुस्सा, भरत तिवारी एनकाउंटर और कुत्ता-बिल्ली वाले बयान... भाजपा के गढ़ में PK का सियासी विस्फोट, 51 हजार वोट भी नहीं जुटा सकी बीजेपी, जानिए हार की बड़ी वजहें
Bihar Politics:जिस सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार जीतते रहे, उसी सीट पर भाजपा को ऐसी शिकस्त मिली जिसने पूरे संगठन को झकझोर दिया। आखिर अभेद किला के ढ़हने के कारण क्या हैं....
Bihar Politics: बिहार की राजनीति में कई चुनाव आते हैं, कई नतीजे सुर्खियां बनते हैं, लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो सिर्फ एक सीट का परिणाम नहीं होते, बल्कि पूरी सियासत की दिशा बदलने का इशारा बन जाते हैं। पटना की बांकीपुर विधानसभा का उपचुनाव ऐसा ही एक राजनीतिक भूचाल साबित हुआ है। तीन दशक तक भाजपा का अभेद्य गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि भाजपा के राजनीतिक आत्मविश्वास को भी गहरी चोट पहुंचा दी।सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि जिस सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार जीतते रहे, उसी सीट पर भाजपा को ऐसी शिकस्त मिली जिसने पूरे संगठन को झकझोर दिया। नौ महीने पहले जिस भाजपा ने करीब 51,936 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी, वही पार्टी इस बार कुल 51 हजार वोटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी। दूसरी ओर प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 19,324 वोटों के बड़े अंतर से हराकर जनसुराज का विधानसभा में खाता खोल दिया। यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि बिहार की स्थापित राजनीति को खुली चुनौती है।
छात्र आंदोलन और सीवान में पुलिस कार्रवाई
इस हार के पीछे केवल सत्ता विरोधी लहर नहीं, बल्कि कई ऐसे मुद्दों का संगम दिखाई देता है जिसने भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में भी दरार पैदा कर दी। बांकीपुर विधानसभा में करीब 3.79 लाख मतदाता हैं, जिनमें लगभग 53 हजार से अधिक यानी 14 प्रतिशत मतदाता 29 वर्ष से कम उम्र के हैं। यही Gen-Z वोटर इस चुनाव में सबसे निर्णायक साबित हुए। चुनाव से ठीक पहले सोशल मीडिया पर छात्रों से जुड़े कई वीडियो तेजी से वायरल हुए। इनमें सीवान में पुलिस कार्रवाई तथा छात्रों पर कथित एके 47 से गोलीबारी के वीडियो युवाओं के बीच बड़े पैमाने पर साझा किए गए। इन घटनाओं ने युवा मतदाताओं के भीतर सरकार के प्रति नाराजगी पैदा की। युवाओं ने कथित तौर पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई कार्रवाई को महज खानापूर्ति माना। नतीजा यह हुआ कि पहली बार मतदान करने वाले और युवा वोटरों का बड़ा वर्ग भाजपा से दूरी बनाता नजर आया। भता दें सीवान में पुलिस के छात्रों पर गोली चलाने का मामला बिहार हीं नहीं राष्ट्रीय सुर्खी बना, लोकसभा में मामला उठा। अब देश की सबसे बड़ी अदालत में इसकी सुनवाईआ होने वाली है। प्रशांत किशोर ने अपनी लगभग हर सभा में इस घटना का जिक्र करते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया। चुनाव से पहले हुए छात्र आंदोलन भी भाजपा के लिए भारी पड़ते दिखाई दिए। 22 से 25 जुलाई के बीच पटना समेत कई जिलों में हुए प्रदर्शन के दौरान 694 छात्रों को हिरासत में लिया गया और 335 छात्रों को जेल भेजा गया। बाद में सरकार ने मुकदमे वापस लिए और छात्रों को रिहा किया, लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था। युवाओं के बीच यह धारणा बन चुकी थी कि सरकार पहले दमन करती है और बाद में दबाव में फैसले बदलती है।
सवर्ण वोट भाजपा से खिसका
युवाओं की नाराजगी के साथ-साथ सवर्ण समाज में भी असंतोष की परतें साफ दिखाई दीं। भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत समाज के बीच सरकार के प्रति सवाल उठ रहे थे। भाजपा का सबसे मजबूत सामाजिक आधार माना जाने वाला यही वर्ग इस बार पूरी तरह एकजुट दिखाई दिया और उससे छिटकता दिखा है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने सवर्ण बहुल इलाकों, सोसायटियों, क्लबों और व्यापारिक संगठनों में लगातार छोटी-छोटी बैठकें कीं। उन्होंने लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि कानून व्यवस्था और न्याय के सवाल पर सरकार जवाबदेह नहीं रही।
नीट हत्याकांड और भरत तिवारी एनकाउंटर
जहानाबाद की NEET छात्रा हत्याकांड भी चुनावी बहस का बड़ा विषय बना। चित्रगुप्त नगर थाना की निलंबित प्रभारी रौशनी कुमारी भी इस चुनाव में मुद्दा बनीं। वहीं भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद पुलिस प्रशासन की कार्यशैली, पीड़ित परिवार के आरोप और जांच को लेकर उठे सवालों को भी उन्होंने लगातार जनता के बीच उठाया। एनकाउंटर के बाद भोजपुर एसपी राज के पीड़ित के घर आधी रात को पहुंचने का मुद्दा भी था। पीड़ित परिवार ने एसपी औरएसडीपीओ और एसडीओ पर गंभीर आरोप लगाएअ हगैं. इसकी न्यायिक जांच चल रही है। डीजीपी ने कड़ा एक्शन लेते हुए जवान को सस्पेंड कर दिया है। वहीं एसडीपीओ को आरा से हटा मद्यनिषेध विभाग में पोस्टिंग का मामला भी इस चुनाव में गूंजा। इस तरह नीट छात्र ङत्याकांड से लेकर भरत तिवारी एनकाउंटर तक के कई घटनाओं ने खासकर शिक्षित और मध्यवर्गीय मतदाताओं पर असर डाला।
बांकीपुर में कुत्ता-बिल्ली को भी टिकट दे देंगे तो...
प्रशांत किशोर की पूरी चुनावी रणनीति भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक राजनीति पर आधारित रही। उन्होंने लगातार एक बयान को जनता के बीच दोहराया कि भाजपा नेताओं का दावा है कि बांकीपुर में कुत्ता-बिल्ली को भी टिकट दे देंगे तो भाजपा जीत जाएगी। चाहे इस बयान का राजनीतिक संदर्भ कुछ भी रहा हो, लेकिन इसे चुनाव प्रचार में जिस तरह इस्तेमाल किया गया, उसने मतदाताओं के आत्मसम्मान को सीधा संबोधित किया। लोगों के बीच यह संदेश गया कि भाजपा बांकीपुर की जनता को टेकन फॉर ग्रांटेड मान बैठी है। इसके उलट प्रशांत किशोर ने चुनाव को पूरी तरह जनसंपर्क आधारित बनाया। उन्होंने घर-घर जाकर संपर्क किया, पदयात्रा निकाली और दावा किया जाता है कि 30 दिनों तक प्रतिदिन पांच "चाय पर चर्चा" और दो जनसभाएं आयोजित कीं। उन्होंने हर वर्ग के लोगों से सीधा संवाद किया और चुनाव को नेता बनाम जनता की लड़ाई के रूप में पेश किया।
यादवों ने पीके को माना सुदामा
दिलचस्प बात यह रही कि इस चुनाव में यादव मतदाताओं का भी एक हिस्सा परंपरागत ध्रुवीकरण से अलग दिखाई दिया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही कि कुछ प्रभावशाली यादव नेताओं ने प्रशांत किशोर के समर्थन में यह कहते हुए माहौल बनाया कि ब्राह्मण सुदामा हैं, हमने सुदामा का साथ दिया है। यह प्रतीकात्मक संदेश सामाजिक समीकरणों में बदलाव की ओर संकेत करता है।
बांकीपुर की सामाजिक संरचना भी इस चुनाव को समझने में महत्वपूर्ण है। यहां लगभग 15 प्रतिशत कायस्थ, 20 से 22 प्रतिशत भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत, करीब 12 प्रतिशत वैश्य, 10 से 12 प्रतिशत यादव, 10 से 12 प्रतिशत कुर्मी-कोइरी, 8 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 7 से 8 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। इतने विविध सामाजिक समीकरणों वाले क्षेत्र में यदि भाजपा का पारंपरिक सवर्ण और शहरी मध्यवर्गीय आधार खिसकता है तो यह सिर्फ स्थानीय घटना नहीं मानी जाएगी।
भाजपा के साथ जदयू की चिंता बढ़ी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस परिणाम ने यह संकेत दे दिया है कि भाजपा का सबसे मजबूत शहरी, मध्यवर्गीय और अपर कास्ट वोट बैंक अब पहले जैसा अभेद नहीं रहा। इस नतीजे का असर सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं रहेगा। जदयू के लिए भी यह परिणाम चिंता का विषय बन सकता है। यदि भाजपा का जनाधार कमजोर होता है तो गठबंधन की पूरी राजनीतिक संरचना प्रभावित होगी। जदयू पहले ही गठबंधन की राजनीति पर निर्भर है और पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर का उभार जदयू के असंतुष्ट नेताओं को भी नया राजनीतिक विकल्प दे सकता है।
मुस्लिम-यादव समीकरण हुआ कमजोर
दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी यह जीत आसान संकेत नहीं है। सत्ता परिवर्तन चाहने वाले युवा मतदाता, जो अब तक राजद की ओर देखते थे, अब जनसुराज को विकल्प मान सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा मुस्लिम वोट बैंक को लेकर भी माना जा रहा है। यदि भाजपा को रोकने के लिए मुस्लिम मतदाताओं का एक हिस्सा जनसुराज की ओर शिफ्ट होता है तो राजद का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण कमजोर पड़ सकता है। बांकीपुर के दुजरा, सब्जीबाग और आसपास के मुस्लिम बहुल इलाकों में जनसुराज की बढ़ती स्वीकार्यता ने इसी संभावना को हवा दी है।
हालांकि यह भी सच है कि किसी एक उपचुनाव के आधार पर पूरे बिहार की तस्वीर तय नहीं की जा सकती। विधानसभा चुनाव में भाजपा, राजद और जदयू जैसी पुरानी पार्टियों के पास मजबूत संगठन, गांव-गांव तक फैला कैडर और संसाधनों का विशाल नेटवर्क मौजूद रहेगा। जनसुराज को उस मुकाबले में कहीं अधिक कठिन चुनौती का सामना करना होगा।
फिर भी बांकीपुर का संदेश साफ है। छात्रों के आंदोलन, सीवान में कथित पुलिस कार्रवाई, जहानाबाद छात्रा हत्याकांड, भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर उठे सवाल, भाजपा नेताओं के कथित कुत्ता-बिल्ली वाले बयान, सवर्ण समाज की नाराजगी, यादव वोटों में सेंध और प्रशांत किशोर की आक्रामक जनसंपर्क रणनीति इन सभी कारकों ने मिलकर भाजपा के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले किले को ढहा दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या बांकीपुर सिर्फ एक उपचुनाव था, या फिर बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत? इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि इस नतीजे की गूंज सिर्फ पटना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक सुनाई देगी।