आज ही के दिन बारा नरसंहार में 35 बेकसूर मारे गए थे, BJP ने तेजस्वी से पूछा- लालू राज में हुए इस जनसंहार के लिए प्रायश्चित करेंगे?

आज ही के दिन बारा नरसंहार में 35 बेकसूर मारे गए थे, BJP ने तेजस्वी से पूछा- लालू राज में हुए इस जनसंहार के लिए प्रायश्चित करेंगे?

PATNA: आज ही के दिन यानी 12 फऱवरी1992 को बारा नरसंहार की घटना हुई थी। इस नरसंहार में 35 बेकसूर लोगों को नक्सलियों ने गला रेत कर मार डाला था। तब बिहार में लालू प्रसाद का शासनकाल था। इस नरसंहार के बाद पूरे देश में बिहार की काफी फजीहत हुई थी। मृतकों में सभी भूमिहार जाति के किसान थे। गया जिले की टिकारी प्रखंड अंतर्गत बारा गांव के लोग आज भी 29 साल पहले 12 फरवरी 1992 की उस मनहूस रात को याद कर सिहर जाते हैं। इसी रात को गांव के पश्चिमी हिस्से से आए हथियारबंद दर्जनों दरिदों ने 35 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी थी। बीच-बचाव में आई महिलाओं को हथियार की बट से बेरहमी से पीटा गया था। महिलाओं ने अपनी आंखों के सामने अपने सुहाग को मिटते देखा था। किसी ने बेटा खोया तो कइयों के सिर से पिता का साया उठ गया था। 

तेजस्वी जी क्या इसके लिए भी प्रायश्चित करेंगे ?

आज इस घटना के 29 साल हो गए। आज के दिन बीजेपी ने एक बार फिर से राजद से सवाल पूछा है। तब के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के बेटे व वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव से  बीजेपी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संतोष रंजन राय ने पूछा है कि इसके लिए आप कब प्रायश्चित करेंगे ? बीजेपी ने कहा है कि गया जिले के बारा गाँव में 12 फ़रवरी 1992 की रात 35 भूमिहारों की हत्या कर दी गयी थी जो सभी किसान थे। क्यों तेजस्वी यादव , आपके पिता के राज में जो प्रायोजित हत्यायें हुई किसानों की, इन सामूहिक नरसंहार के लिए आप बिहार में कब प्रायश्चित यात्रा,अनशन करेंगे?

नरसंहार के चार दोषियों को मिली फांसी की सजा को राष्ट्रपति ने आजीवन कारावास में बदला था

2फरवरी, 1992 को हुए बारा नरसंहार के चार दोषियों की फांसी की सजा को राष्ट्रपति ने आजीवन कारावास में बदल दिया था. चारों दोषियों ने राष्ट्रपति के पास माफी की अर्जी लगाई हुई थी। इस नरसंहार में एमसीसी के उग्रवादियों ने भूमिहार जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को बहाल रखा था। तीन जजों में दो सजा बहाल करने के पक्ष में थे, एक इसके खिलाफ। गया के जिला एवं सत्र न्यायाधीश जवाहर लाल चौधरी ने 8 जून, 2001 को इस मामले में फैसला सुनाया था

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