भगवान 'कृष्ण' के नाम वाले पूर्व मंत्री का हाल हुआ बेहाल, 'वजीर'-विधायक और बंगला जाने के बाद अब साधारण कुर्सी भी नसीब नहीं

भगवान 'कृष्ण' के नाम वाले पूर्व मंत्री का हाल हुआ बेहाल, 'वजीर'-विधायक और बंगला जाने के बाद अब साधारण कुर्सी भी नसीब नहीं

PATNA: एक समय की बात है...भगवान कृष्ण के पर्यायवाची नाम वाले नेताजी की चलती देखते बनती थी। अपने को बात-बात में चंद्रशेखर के अनुयायी बताने वाले नेताजी को कम उम्र में ही राजनीति की कई उपलब्धियां हाथ लग गई।लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा वाली रेलगाड़ी किसी एक स्टेशन पर रूकने का नाम नहीं ले रही थी। जहां, कम वक्त में सबकुछ हासिल हुआ था उसी दल में एक अर्से के बाद इनका दिल उचटने लगा। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि उस दल में एक और भगवान राम के नाम वाले नेता की काफी चलती थी। इन्हीं की तरह वे भी अपने सुप्रीमो के काफी करीब थे। लेकिन वक्त के साथ उस दल में भाव कमने लगा, फिर दिल न लगने का बहाना और अपने ही सुप्रीमो पर बहुत सारे इल्जाम लगाकार बड़े ही इल्म से दल और दिल दोनों बदल लिया। दल बदलना और तत्कालीन मुख्यमंत्री को जमकर कोसने का भरपूर इनाम भी मिला।

सुप्रीमो को कोसने का राजा से भरपूर लिया था इनाम

यहां आकर फिर से वजीर बन गए। राजा के भी काफी करीब हो गए....।महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी के साथ संगठन में भी दो-दो हाथ करने लगे। लेकिन एक कहावत है न...बद अच्छा बदनाम बुरा. समय के साथ बदनामी का गुबार यहां भी उठने लगा. जिस विभाग में वजीर थे वहां भी गंभीर इल्जाम लगा और खामियाजा भी 2015 के चुनाव के बाद भोगना पड़ा। स्थिति यह हो गई कि ये एक वीवीआईपी सड़क पर स्थित बंगला वाले नेताजी बनकर रह गये.....वहीं, दूसरी तरफ वजीर का पद हाथ से सरक गया था। इस बीच अपने राजा को लेकर इनका एक ऑडियो भी वायरल हुआ जो बचा-खुचा आधार का भी बंटाधार कर दिया।

राजा ने गुनाह किया माफ और फिर से झोली में डाल दी वजीर की गोली

एक अंतराल के बाद और अच्छे खासे बवाल के बाद राजा ने सबकुछ माफ करते हुए फिर से इनकी झोली में वजीर की गोली डाल दी। इस गोली से इनका मर्ज कुछ दिनों के लिए दब गया। लेकिन राजा के करीबी एक बड़े नेता के रडार पर ये लगातार बने हुए थे। ऐसा इल्जाम भी ये लगाते रहे हैं. इसी बीच वजीर साहब ने राजा  की नजर में अपनी ताकत दिखाने के लिए जाति की तराजू पर वोट के आंकड़ों का खेल दिखाना शुरू किया। लेकिन यही बात राजा और उनके करीबी बड़े नेता को नागवार गुजरी। 

राजा को गच्चा देने से पहले ही कर दिये गए थे पैदल

विधानसभा चुनाव से पहले ताकत की जोर-आजमाइश फुस्स साबित हो गई। भाव अभाव की मार से तार-तार हो गया। फिर भला करते क्या....बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक छटपटाहट इस कदर बढ़ी कि सियायत की पानी की तलाश में जाकर पुराने तालाब में गिर पड़े। राजा के वजीर रहते हुए इन्होंने अपना रास्ता पक्का करने के लिए रात के अंधेरे में अपने पहले राजा की हवेली जा पहुंचे। युवराज से मुलाकात हुई और डिल पक्की हो गई। इसके बाद वजीर साहब ने राजा को बड़ा गच्चा देने का ठान लिया. वजीर साहब ने अपने खास लोगों को बुलाया और फैसले से अवगत कराया। खास लोगों ने वजीर साहब को ऐसा निर्णय लेने से मना किया.  लेकिन भला युवराज से डील पक्की होने के बाद ये कहां मानने वाले थे......ऐलान कर दिया कि सोमवार को वे इस्तीफा कर देंगे। यह खबर जैसे ही राजा के पास पहुंची इसके बाद इनकी हवा निकालने की कवायद शुरू कर दी गई। शाम होते-होते राजा ने वजीर पद से बर्खास्त कर दिया वहीं अध्यक्ष ने पार्टी से पैदल कर दिया।

युवराज के सामने हुए नतमस्तक तो विधायकी के टिकट से भी गए

इसके बाद नेताजी समाजवाद को आबाद करने के चक्कर में विधानसभा पहुंचे और विधायकी से इस्तीफा किया और बंगला भी खाली कर दिया। फिर पुराने हवेली पहुंचकर युवराज के सामने नतमस्तक हो गए। कल तक जिसको भ्रष्टाचारी कहते थे उसको सरोकारी कहते अघा नहीं रहे थे। कुछ दिन तक तो लगातार पुरानी व आज की नई हवेली में हवाखोरी को जाते रहे। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इनके लिए हवेली के दरवाजे बंद हो गए और नई आफत शुरू हो गई। अब दूरभाष पर भी दर्द सुनने को कोई तैयार नहीं था। युवराज ने ऐसा खेल खेला कि इनके माननीय बनने का खेल ही समाप्त कर दिया। जानकार बताते हैं कि पिछले एक दशक तक चुन-चुन कर इन्होंने जो युवराज और उनके पिता के लिए भाषा का इस्तेमाल किया था उसको सुप्रीमो के परिवार ने बड़े ही दिल से ले लिया था। परिणाम सबके सामने है .

अब न निगलते बन रहा है न उगलते....

अब वक्त ऐसा आ गया है कि न निगलते बन रहा न उगलते। हालांकि समाजवाद को आबाद करने के लिए स्कूली बच्चे की तरह तय समय पर दल के प्रदेश पाठशाला पहुंच जा रहे हैं. लोग बताते हैं कि यहां भी इनका हाल हवेली से जुदा नहीं. स्थिति यह है कि इनकी सियासत की संवेदनशीलता को समझने के लिए कोई तैयार ही नहीं है।पाठशाला के कड़क प्रधान ने भी एक चिट्ठी निकालकर आदेश दे रखा है कि जो भी प्रवक्ता हैं वो चैंबर में बैठ कर बयान देंगे। इस आदेश के बाद तो इनके लिए नये किस्म की आफत इनके गले पड़ गई है। करीबी बहुत आहत हैं कि ओह... आज से कुछ दिन पहले नेताजी का रूआब देखते बनता था, आज की तारीख में ये न तो प्रवक्ता हैं और न पार्टी में कोई बड़े पदधारक । लिहाजा करें तो क्या....पहले तो पार्टी दफ्तर आकर अपने नये सुप्रीमो तो कभी युवराज के गुणगान में मस्त रहते थे। लेकिन इनके सामने ही राजनीति में खड़ा हुए एक नेता ने ऐसी लंगड़ी मारी कि ये फिर से पैदल हो गए...... अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि दफ्तर में कुर्सी के लिए भी छटपटा रहे हैं और पांचवे-छठे नंबर के नेता के सामने बैठना पड़ रहा.....। इसे कहते हैं समय का हाथ से निकल जाना,अब तो इनके नाम वाले भगवान ही इनके मालिक हैं.

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