DGP साहब...आपके कर्तव्य में कर्म कम और करामात ज्यादा दिखने लगे तो भला मीडिया क्या करे....

DGP साहब...आपके कर्तव्य में कर्म कम और करामात ज्यादा दिखने लगे तो भला मीडिया क्या करे....

PATNA:  तो डीजीपी साहब....जरा सुनिए आप जिस समय भाषण दे रहे थे ठीक उसी समय चंद किमी की दूरी पर बेखौफ अपराधियों द्वारा हत्या की घटना को अंजाम दिया जा रहा था।आप मीडिया के कर्तव्यों पर मलाल खा रहे थे उसी दौरान अपराधियों के द्वारा मौत की इबारत लिखी जा रही थी।याद कीजिए कि कैसे आपके आश्वासन की आश में बैठे एक फौजी बाप को उसके लाड़ले की लाश मिली और किसी ने खबर लिखा तो आपको बुरा लग रहा है.....सुशासन की सरकार में आप हीं के एक जांबाज दारोगा-सिपाही को न सिर्फ अपराधी मार डालते हैं बल्कि एके-47 भी लूटकर चलते बनते हैं।इस तरह की घटना घटित होने के बाद क्या किया जाए?

राजधानी पटना में दिनदहाड़े हत्या,लूट,छिनतई की घटनाओं को बेखौफ अपराधियों के द्वारा अंजाम दिया जा रहा है तो मीडिया क्या करे....क्या उसे नहीं दिखाए या नहीं लिखे? एक शख्स दो-दो एके-47 लहराते दिखे क्या उस खबर को मीडिया नहीं दिखाए... बेगूसराय में डीआईजी कार्यालय से चंद कदम की दूरी पर बस मालिक की हत्या की खबर भी नहीं चलाई जाए....सूबे में दिनदहाड़े लूट की घटना हो रही क्या उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए...राजधानी में अबतक की सबसे बड़ी स्वर्ण लूट  की खबर भी नहीं दिखाई जाती...गोपालगंज में ठेकेदार को जिंदा जलाए जाने की खबर भी नहीं चलाई जाए..उत्तर बिहार में आधा दर्जन फाईनेंस कंपनी की ळूट की खबर भी नहीं चलनी चाहिए थी क्या?

साहब...मीडिया तो अपने कर्तव्य का पालन करने में जुटी है।जब आपके कर्तव्य में कर्म कम और करामात ज्यादा दिखने लगता है तो मीडिया क्या करे....जाहिर सी बात है कानून के इकबाल के कम होने पर बढ़ रही गुंडागर्दी पर मीडिया मौन नहीं रह सकता।जानते हैं... दिक्कत क्या है,मीडिया जिसके मन लायक काम नहीं करती है तब वह अपनी परिभाषा गढ़ कर मीडिया को हीं दोषी ठहराने लगता है।लेकिन उपरोक्त लिखित घटनाओं से आप भी सहमत होंगे..जहां पुलिस की सक्रियता के दावे की धज्जियां उड़ती दिखती है।

बिहार में हत्या,लूट,डकैती,छिनतई,बलात्कार,गुंडागर्दी करने के लिए अपराधी रात का इंतजार नहीं करते बल्कि सबकुछ दिनदहाड़े होता है,मतलब निरंकुशता । हम ऐसा नहीं कह रहे कि पुलिस 100 फीसदी निष्क्रिय हो गई है।आपके अच्छे कामों को मीडिया लगातार तरजीह देती है, लेकिन बेलगाम अपराध से मीडिया का मन भी आहत होता है।जो शर्तिया तौर पर आपकी आंखों से नहीं देखा जा सकता। इसीलिए मीडिया द्वारा दिखाई गई सच्चाई आपको कड़वी लग रही है।आपने पंचवटी ज्वेलर्स लूटकांड के उदभेदन को अपने सफलता की श्रेणी में रखकर उसका जिक्र किया है,उसके लिए शुक्रिया। लेकिन जरा सोचिए तो डीजीपी साहब कि पटना के सबस् व्यस्तम रोड़ पर दिन के 12 बजे लगातार आधे घंटे तक रूककर डाका डाला जाता है और मजे से अपराधी फरार हो जाते हैं...क्या नहीं लगता कि अपराधियों और पुलिस के मनोबल के ग्राफ में बड़ा गैप हो चुका है? नहीं तो क्या मजाल कि कानून के रौब के सामने गुंडे कुछ सोंच भी सकें।लेकिन जब वर्दीधारियों की सोंच बदलती है तो अपराधियों का सलीका भी बदल जाता है और परिणाम यह होता है कि दिनदहाड़े आम आदमी मारा और लूटा जाता है।

जाहिर सी बात है मीडिया अपना कर्तव्य का पालन करता रहेगा बाकी परिभाषा गढ़ना आपका काम है।आपके संजीदगी भरे कामों को सलाम... लेकिन मीडिया वर्दी की निष्क्रियता पर भी उतना हीं जर्बदस्त चोट करने को तैयार हैे।आपका काम सोना लूट से लेकर एके-47 का उदभेदन का तो हैं हीं लेकिन मूल मकसद घटनाओं को रोकना है।

साहब...मुख्यमंत्री जी ने भी आपको अहसास कराया था

चलिए आपको याद दिला देते हैं इसी मंच से कुछ दिन पहले बिहार के मुख्यमंत्री ने भी मीडिया की परिभाषा बताई थी कि अच्छे काम करने वालों मीडिया सर पर बिठाती है लेकिन अगर कहीं कुछ गड़बड़ी हुई तो वही मीडिया कब्र भी खोद देती है। 


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