पुण्यतिथिः एक महान गीतकार बनने का सफर, मोहम्मद रफी

पुण्यतिथिः एक महान गीतकार बनने का सफर, मोहम्मद रफी

अपने संगीत से सबके दिलों पर राज करने वाले मोहम्मद रफी की आज पुण्यतिथि है. उनका निधन 31 जुलाई 1980 को हुआ था. वह पंजाब के कोटला सुल्‍तान सिंह गांव में जन्में थे और वहां से मुंबई ही नहीं बल्कि दुनिया भर में अपनी पहचान बनाएं। उनके आवाज से भारत के कई संगीतकार जैसे को प्रेरणा मिली और आज वें दुनिया के बड़े संगीतकार भी हैं. उन्होंने सिर्फ भारत की भाषाओं ही नहीं बल्कि पारसी, डच, स्पेनिश और इंग्लिश में भी गीत गाए थे। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम आपको बताएंगे उनसे जुड़ी कई बातें:

मोहम्मद रफी ने अपने करियर में कुल 26,000 से ज्यादा गाने गाए हैं. उन्होंने अपनी गांव में गली के फकीरों से गाना गाने के लिए सीखा। उन्होने दिलीप कुमार, किशोर कुमार, शमी कपूर, देवानंद और राजेंद्र कुमार जैसे कई कलाकारों की फिल्मो में अपनी आवाज दी है और उनमें सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह हर कलाकार के आवाज में फिट हो जाते थें. उनका आखिरी गाना "शाम फिर क्यों उदास है दोस्त" फिल्म "आस पास" के लिए था. अपनी करियर में उन्होंने 6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड समेत कई पुरस्कार हासिल किया है. एक इंटरव्यू के दौरान लता मंगेशकर ने भावुक होकर रफ़ी के बारे कहा, "सरल मन के इंसान रफी साहब बहुत सुरीले थे। ये मेरी खुस्किस्मती है कि‍ मैंने उनके साथ सबसे ज्यादा गाने गाए। गाना कैसा भी हो वो ऐसे गा लेते थे कि‍ गाना ना समझने वाले भी वाह-वाह कर उठते थे। ऐसे गायक बार-बार जन्‍म नहीं लेते।"

सिर्फ इतना ही नहीं, 1962 में जब भारत और चीन में जंग छिड़ गयी थी तब उन्होंने जंग के मैदान में भारतीय सैनिक का हौसला बढ़ाने के लिए गीत गाय था. संगीत की दुनिया में तो उन्होंने महानता हासिल की ही थी, इसके साथ-साथ उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में काफी नाम कमाया। जी हां, आपको नहीं पता हो तो बता दें कि उन्होंने फिल्म 'लैला मजनू' और 'जुगनू'  में एक्टर का काम किया है जो बॉक्स ऑफिस पर हिट भी हुई और काफी अच्छी कमाई भी की. मोहम्मद रफी ने ज्यादातर गाने संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कितनी बार उन्होंने एक रूपए में भी गाना गाया है.उन्होंने हिंदी के अलावा असमीज, कोंकणी, भोजपुरी, अंग्रेजी, तेलुगु, मैथिली और गुजराती में भी गाना गाय है.

आपको बता दें कि मोहम्मद रफ़ी की निधन के बाद उनके अंतिम यात्रा में करीब 10000 लोग शामिल हुए थें और उस दिन मुंबई में जोरों की बारिश हो रही थी. उनके जाने पर मशहूर एक्टर मनोज कुमार ने कहा था, "'सुरों की मां सरस्वती भी अपने आंसू बहा रही हैं आज." मोहम्मद रफ़ी आज भले ही सबसे साथ नहीं हैं पर अपनी संगीत से वह आज भी सबके दिलों में जिन्दा हैं.

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