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बिहार के पूर्व डीजीपी ने साहिबगंज में बिताए अपने अनुभव किए साझा - यहां एक सीख मिली ' सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो, संचालन पैसा ही करती है

बिहार के पूर्व डीजीपी ने साहिबगंज में बिताए अपने अनुभव किए साझा - यहां एक सीख मिली '  सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो, संचालन पैसा ही करती है

PATNA : बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद की गिनती उन पुलिस अधिकारियों में रही है। जिन्हें अपराध पर नियंत्रण कैसे किया जाए, यह बेहतर तरीके से पता है। बिहार में डीजीपी रहने के दौरान उन्होंने यह साबित भी किया था। लेकिन यह हमेशा नहीं था। यह बात खुद पूर्व डीजीपी ने साझा की है। उन्होंने अविभाजित बिहार के साहिबगंज में चार दशक पहले बिताए गए अपने अनुभव साझा किए हैं। जिसे उन्होंने अपने एक पोस्ट के द्वारा बताया है कि पैसे से क्या कुछ नहीं किया जा सकता है। फिर चाहे सरकार किसी की भी हो. अंत में फैसला पैसे से ही होता है।

साहिबगंज में बिताए अपने अनुभव शेयर करते हुए उन्होंने लिखा है...

पिछले दो दिनों से झारखण्ड के साहिबगंज ज़िले के खदानों की आर्थिक शक्ति की चर्चा मीडिया पर हो रही है। मेरी करीब 40 वर्ष पूर्व की स्मृतियाँ ताज़ा हो उठीं। वर्ष 1983 का वर्षांत। मेरा पदस्थापन साहिबगंज ज़िले के पुलिस अधीक्षक के रूप में हुआ। तब बिहार का विभाजन नहीं हुआ था। मुझे इस ज़िले के सम्बन्ध में लेश मात्र की भी जानकारी नहीं थी। 

मैं 24 घंटे में समझ गया कि इस ज़िले में सरकारी पैसे की लूट और खनिज सम्पदा की लूट, दो ही समस्याएँ हैं। पाकुर में विश्व स्तरीय ग्रेनाइट उपलब्ध था जिसको बड़े तथाकथित खान मालिक, जो कानूनी रूप से मात्र खान पट्टेदार थे, कौड़ियों के भाव ट्रेन से बाहर भेज रहे थे। माल गाड़ी में भी वज़न की हेरा-फेरी कर, उस ज़माने में भी करोड़ों का चूना राजकीय राजस्व को लगा रहे थे। 

इधर साहिबगंज की गरीबी स्पष्ट दिखती थी। आदिवासी और पहाड़िया दया के पात्र थे। खान के मजदूर। "मालिक" की संज्ञा में थे बड़े-बड़े धन्ना सेठ जिनका साहिबगंज के आर्थिक विकास से कोई लेना-देना नहीं था, मगर उनका उत्तरोत्तर विकास स्पष्ट दिखता था। 

मैंने खनन में हो रही धांधली में लगभग 50 कांड दर्ज़ कराकर अनुसंधान शुरू किया। 

खलबली मची। नतीजा - 5 महीने में मेरा तबादला न सिर्फ साहिबगंज से, बल्कि बिहार राज्य से बाहर, भारत सरकार के IB में हो गया।  खान मजदूरों ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया। रोड रुका, ट्रेनें रुकीं। सरकार चिंतित हुई तो दुमका के कमिश्नर, जो एक बहुत ही ईमानदार IAS पदाधिकारी थे, को साहिबगंज भेजा गया कि प्रभार शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हो जाए। 

सहसा दो गंभीर बातों का ज्ञान 6 साल की नौकरी में ही हो गया -

1. पैसे की शक्ति से बच पाना असंभव है 

2. सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो, संचालन पैसा ही करती है