नगर निकाय चुनाव में जातिगत चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, चुने गए जनप्रतिनिधियों की बढ़ी धड़कनें

नगर निकाय चुनाव में जातिगत चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, चुने गए जनप्रतिनिधियों की बढ़ी धड़कनें

PATNA :  बिहार में नगर निकाय चुनाव के दो चरण पूरे हो चुके हैं और नए चुने गए जनप्रतिनिधियों ने अपनी जिम्मेदारी भी संभाल ली है। लेकिन, इन सबके बावजूद इन सभी चुने गए पार्षद, मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षदों के लिए आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट में आज निकाय चुनाव में आरक्षण को लेकर अहम सुनवाई होनी है। जिसमें बिहार में निकाय चुनाव के लिए सरकार की ओर से गठित अति पिछड़ा वर्ग आयोग की योग्यता पर फैसला होना है।

पिछले माह कोर्ट ने दी थी तारीख

दिसंबर माह में ईबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई होनी थी। उम्मीद थी चुनाव से पहले कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी। लेकिन कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए 20 जनवरी की तारीख निश्चित कर दी। इस बीच बिहार में दो चरणो में प्रदेश में बड़े हिस्से में चुनाव संपन्न करा दिए गए। अब अगर कोर्ट चुनाव को अवैध घोषित करती है, सभी चुने गए नए जनप्रतिनिधियों की सदस्यता भी रद्द हो सकती है।

क्या है विवाद

पटना हाईकोर्ट की तरफ से निकाय चुनाव पर रोक लगाने के बाद बिहार सरकार की तरफ से अक्टूबर में अति पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया गया। दो महीने के भीतर कमेटी अपनी रिपोर्ट सरकार को दी। इससे पहले ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को डेडिकेडेट मानने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी सरकार उसी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने की अनुशंसा कर दी। अनुशंसा मिलते ही निर्वाचन आयोग ने नए डेट की भी घोषणा कर दी गई है और चुनाव करा लिए गए। रिपोर्ट के बाद भी केवल चुनाव की डेट बदली, इसके अलावा कुछ नहीं बदला।

सिर्फ तारीख बदली और कोई बदलाव नहीं

हाईकोर्ट ने कहा था कि अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के लिए 20% आरक्षित सीटों को जनरल कर नए सिरे से नोटिफिकेशन जारी करें। लेकिन निर्वाचन आयोग की तरफ से बस चुनाव की तिथि को बदला गया। इसके अलावा किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है। न हीं आरक्षण की स्थिति में और न ही अलग से नोटिफिकेशन जारी किया गया है।

आयोग के काम पर उठे सवाल

ईबीसी का गहन अध्ययन के बाद डेटा तैयार करना था। लेकिन इसके नाम पर बस खानापूर्ति की गई है। बिना डेटा के भी आरक्षण का दर 20% था और आरक्षण के बाद भी 20% भी रह गया। रिपोर्ट सरकार के पास से होते हुए निर्वाचन आयोग तक पहुंच गई है लेकिन, उसे अभी तक जारी नहीं किया गया है।

डेडिकेटेड कमीशन को राज्य के सभी नगर निकायों में अति पिछड़ा वर्ग के जातियों को डाटा कलेक्ट करना था। इसके साथ ही इन्हें पता लगाना था कि नगर पालिका की कुल जनसंख्या में पिछड़ों की संख्या कितनी है, यह कितना प्रतिशत होती है। साथ ही इनकी कुल जनसंख्या क्या है ये भी पता लगाना था। टोटल जनसंख्या के अनुपात के अनुसार उनका प्रतिनिधित्व है कि नहीं इसकी रिपोर्ट इन्हें सरकार को सौंपनी थी। इसमें यह भी निर्धारित करना था कि किसी मामले में आरक्षण अपर सिलिंग 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।


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