राहुल की नेतृत्व क्षमता व हताश पैदा करनेवाले नेताओं की लंबी कतार के बीच कमजोर होती कांग्रेस

राहुल की नेतृत्व क्षमता व हताश पैदा करनेवाले नेताओं की लंबी कतार के बीच कमजोर होती कांग्रेस

Kaushlendra priyadarshi : कांग्रेस की काया चुनाव दर चुनाव धीरे धीरे कमजोर होते जा रही है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस वाकई जमीनी तौर पर पूरी तरह अपने वजूद को खुद व खुद ही काट रही है, क्या कांग्रेस के पास एक सक्षम नेतृत्व का सख्त अभाव उसे हताश कर रहा है? या फिर हताश नेताओं की लंबी कतार कांग्रेस के कद को प्रतिदिन छोटा करते जा रहा है। इन सबों के बीच कांग्रेस की कुंडली में बैठे राहुल गांधी और नकारात्मक सोच वाले नेताओं की लंबी जमात कांग्रेस के भविष्य को भंवर में फंसाने को उतावला नजर आते हैं।

कुल मिलाकर कांग्रेस को मिल रही लगातार असफलताओं के लब्बोलुआब पर माथापच्ची करने के बाद कांग्रेस की बर्बादी के जिम्मेदार राहुल गांधी ही दिखाई देते हैं। 

ऐसा इसलिए कि सम्वेदनशील मुद्दे पर अक्सर राहुल अपने बयानों से पार्टी के लिये मुसीबत खड़ी कर देते हैं। क्या राहुल में नेतृत्व क्षमता है ही नहीं! जिसकी वजह से कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व मुख्य रूप से कार्यों को करने या संभव बनाने का विज्ञान है। लेकिन भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक  देश में स्थिति उल्टी है। यहां अगर आप काम को होने से रोक सकते हैं तो आप नेता बन सकते हैं। अगर आप काम-काज ठप्प करा सकते हैं, शहर बंद कर सकते हैं, सडक़ रोको, रेल रोको जैसे आंदोलन सफल करा सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आप नेता बन सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि देश को रोकने की कला नेता बना रही है।

लेकिन वाकई ऐसा है नहीं, नेता वही हो सकता है जिसके पास खुद से बड़ा लक्ष्य हो। किसी देश,समाज या फिर पार्टी नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए।

अपनी व्यक्तिगत जीवन-यापन की चिंताओं से परे जाकर वह जीवन को एक बड़े फ लक पर देख रहा होता है। नेता का मतलब है: एक ऐसा व्यक्ति जो उन चीजों को देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते। ऐसा न हो तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर एक नेता भी वही चीजें कर रहा है, जो हर कोई कर रहा है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर उसकी भी वही सोच है जो हर किसी की है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। तब तो नेताओं के बिना हम और बेहतर कर सकते हैं। नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए। इसीलिए एकनेताजरूरी हो जाता है.

राहुल की नेतृत्व क्षमता परखने के लिये अब जरा इन इन मुद्दों पर दिए गए राहुल गांधी के बयानों पर गौर कीजिए वर्तमान भारत चीन सीमा विवाद इसका ताजा उदाहरण है. दो देशों के बीच चल रहे विवाद और कूटनीतिक मुद्दों पर सार्वजनिक सवाल पूछ कर राहुल ने खुद ही पाने राजनीतिक अदूरदर्शिता और संवेदनहीनता का परिचय दे दिया । इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी ना सिर्फ राहुल गांधी का बचाव करती है बल्कि वह राहुल के बयानों से बिल्कुल प्रभावहीन दिखती है

बार-बार विपक्ष का सरकार से सवाल पूछना 100 फ़ीसदी सही है लेकिन सवाल क्यों कब और कैसे पूछा जाए यह समझ ना कहीं ज्यादा जरूरी है मूल रूप से एक राजनेता को राजनीतिक सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी होना जरूरी है खासकर जब दो देशों के बीच तनाव भरा माहौल चरम पर हो और कूटनीतिक मुद्दे पर एक-दूसरे को मात देने को चालें चली जा रही हो उस दौरान सवाल पूछने के बजाय एकजुटता दिखाना कहीं जरूरी होता है

जरा याद कीजिए कि कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी तो कांग्रेस ने उस दौरान भी बहिष्कार कर दिया था। अब इस बार भी भारत चीन मुद्दे के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक बुलाई तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एकजुटता दिखाने के बजाय सवालों की झड़ी लगा दी और स्पष्ट तौर पर सरकार के साथ खड़े होने से मना कर दिया ।

बता दें कि 2 दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया था कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। गौरतलब है कि चीन के खिलाफ पहली दफा भारत के किसी प्रधानमंत्री के द्वारा ऐसा सख्त बयान दिया है। राहुल गांधी के बयान और कांग्रेस के रवैया से उसके सहयोगी दल खुश नहीं दिखते हैं ।तभी तो एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने राहुल गांधी को सीख देते हुए कहा कि सीमा पर सैनिक हथियार के साथ जाते हैं या नहीं ऐसे सवालों में राजनीतिज्ञों को नहीं उलझना चाहिए राहुल गांधी बार-बार यही आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार ने शहीद हुए सैनिकों को सीमा पर निहत्था भेजा था। चुकी शरद पवार रक्षा मंत्री रह चुके हैं और वे इस तरह के मुद्दों की संवेदनशीलता को समझते हैं।

इतना ही नहीं विपक्ष में बैठे बैठे अन्य नेताओं के बयानों पर भी गौर कीजिए और समझ ही है कि संवेदनशील मुद्दों को लेकर एक ऐसी राजनीति कर रहे हैं मोदी सरकार के कट्टर विरोधी ममता बनर्जी ने भी साफ कह दिया है कि ऐसे संकट के समय वे सरकार के निर्णय के साथ खड़े हैं वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी कहा है कि यह राजनीति का वक्त नहीं है तमिलनाडु में जिस द्रमुक के संरक्षण में कांग्रेसी अपना कद बढ़ाना चाह रही है उसके नेता एम के स्टालिन ने भी सरकार के साथ खड़े होने की बात कही है लेकिन इन सारे बयानों का न तो राहुल पर और ना ही कांग्रेस पर कोई असर दिखता है

एक तरफ चीन जहां बयान जारी कर गलवन पर दावा ठोकता है तो कुछ ही देर बाद राहुल गांधी भी ट्वीट करते हुए सरकार पर तंज कसने से बाज नही आते। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के नेताओं के द्वारा सवाल पूछने से पहले उसके अतीत के बारे में जानकारी नहीं दी जाती । सबको याद होगा कि कैसे डोकलाम विवाद के दौरान राहुल गांधी चीनी राजदूत से मिलने गए थे उस दौरान राहुल की मुलाकात को कांग्रेस ने छुपाने का प्रयास किया लेकिन बाद में बातें खुल गई थी कुछ दिन पहले राहुल ने ट्वीट कर कहा था कि चीन के राजदूत समेत अलग-अलग देशों के राजनयिकों से इसलिए मिलने जाते हैं ताकि जानकारी हासिल कर सकें। 

कुल मिलाकर संवेदनशील मुद्दों पर भी बेवजह बखेड़ा खड़ा कर राहुल स्वयं और कांग्रेस के लिए बखेड़ा खड़े करने में जुटे हैं । जनसरोकार के मुद्दे पर भी कांग्रेस को जाग्रत अवस्था मे आने में समय लगता है,जब तक मुद्दों को उठाया भी जाता है तब तक बाजी हाथ से निकल चुकी होती है।

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