पीएम मोदी से ललन सिंह की मांग, सम्राट अशोक को औरंगजेब कहने वाले नाटककार से वापस लें पद्मश्री

पीएम मोदी से ललन सिंह की मांग, सम्राट अशोक को औरंगजेब कहने वाले नाटककार से वापस लें पद्मश्री

पटना. जदयू के  राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने नाटककार दया प्रकाश सिंह से पद्मश्री वापस लेने की मांग की है. दया प्रकाश सिन्हा  ने सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की थी जिसे लेकर ललन सिंह ने आपत्ति जताई है. उन्होंने इसे बिहार और भारत का अपमान बताया है. 

ललन सिंह ने ट्वीट किया, प्रियदर्शी सम्राट अशोक मौर्य बृहत-अखंड भारत के निर्माता थे. उनके बारे में अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल असहनीय है, अक्षम्य है. ऐसा व्यक्ति विकृत विचारधारा से प्रेरित है. महामहिम राष्ट्रपति जी, केंद्र सरकार और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से मांग करते हैं कि ऐसे व्यक्ति का पद्मश्री वापस लें. 

इसके पूर्व एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, सम्राट अशोक के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति किसी सम्मान के लायक नहीं. इनके विरुद्ध नरेंद्र मोदी सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए महामहिम राष्ट्रपति  जी से आग्रह करता हूं कि इनका पद्मश्री व सभी अन्य पुरस्कार रदद् करें. साथ ही उन्होंने भाजपा से मांग की है कि दया प्रकाश सिंह को निष्कासित किया जाए. 

उन्होंने अंखड भारत की दिशा में सम्राट अशोक के अनुकरणीय योगदान को याद करते हुए लिखा, बृहद अखंड भारत के एकमात्र चक्रवर्ती सम्राट "प्रियदर्शी अशोक मौर्य" का स्वर्णिम काल मानवता व लोकसमता के लिए विश्वभर में जाना जाता है। सम्राट अशोक बिहार व भारत के अमिट प्रतीक थे और हैं. सम्राट अशोक मौर्य और बिहार के साथ कोई खिलवाड़ करे, सच्चे भारतीय कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे. प्रियदर्शी सम्राट अशोक मौर्य द्वारा स्थापित अशोक स्तंभ और अशोक चक्र राष्ट्रीय प्रतीक के साथ विश्वविख्यात ऐतिहासिक धरोहर भी है. अशोक महान के नाम से मा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की सरकार बिहार में अनेकों योजनाएं चलाई है.

एक इंटरव्यू में दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक को लेकर कई विवादित बयान दे दिये. उन्होंने अशोक को भाई का हत्यारा बताकर औरंगजेब से तुलना कर दी और क्रुर बताया. अपने पिता की हत्या का कारण भी लेखक ने अशोक के मत्थे दे दिया. बताया कि अशोक बेहद बदसूरत थे और कामुक भी थे. लेखक ने कहा कि देश के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में भी सम्राट अशोक के उजले पक्ष को ही शामिल किया गया है. जबकि उनकी असलियत इससे अलग भी थी. श्रीलंका के तीन बौद्ध ग्रंथों का उन्होंने हवाला देकर ये बयान दिया.


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