महीना पूरा होने से पहले नालंदा के नीरा प्रोसेसिंग प्लांट पर लग गया ताला, सीएम की ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर किया गया था प्रचारित

महीना पूरा होने से पहले नालंदा के नीरा प्रोसेसिंग प्लांट पर लग गया ताला, सीएम की ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर किया गया था प्रचारित

NALANDA/BIHARSAHRIF : अभी एक महीने का समय भी नहीं गुजरा है, जब बिहार शरीफ के बाजार समिति परिसर में बने नीरा प्रोसेसिंग एवं बॉटलिंग प्लांट  काफी तामझाम के साथ नीरा का उत्पादन शुरू हुआ था। लेकिन, में 27 अप्रैल को शुरू हुआ यह प्लांट महज 24 दिन में ही बंद हो गया। न सिर्फ नालंदा बल्कि सूबे के अन्य जिलों में बोतल बंद नीरा बेचने की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है।

नहीं थी डिमांड 

इस प्लांट के बंद होने को लेकर कॉम्फेड के सीईओ पीके सिन्हा कहते हैं कि जितना उत्पादन किया जा रहा था, उतनी नीरा की मांग नहीं थी। खराब होने की शिकायतें भी मिल रही थीं। क्वालिटी में सुधार करने की जरूरत है। वरीय अधिकारियों को इस बारे में लिखा गया है।

छह दिन में हो जाती है खराब

एक दूसरी समस्या यह भी थी कि पैकिंग के बाद कोल्डचेन को अच्छी तरह से मेंटेन करने के बाद छह दिन तक ही नीरा ठीकठाक रहती है। उसके बाद खराब हो जाती थी। इसके अलावा एक समस्या इसमें मिलावट की जांच के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है। यही कारण है कि नीरा की प्रोसेसिंग को बंद करने का फैसला लिया गया।

1500 लीटर हर दिन होना था उत्पादन

कॉम्फेड द्वारा संचालित बॉटलिंग प्लांट में हर दिन कम से कम 1500 लीटर रॉ नीरा की आपूर्ति करने की जवाबदेही जीविका को दी गयी थी। रॉ नीरा को प्रोसेसिंग कर दो सौ एमएल की 7500 बोतल पैकिंग होनी थी। सुधा डेयरी के काउंटरों पर इसकी बिक्री होनी थी।

अब बेरोजगारी बनेगी समस्या

प्लांट में 23 कर्मी काम करते हैं। प्रोसेसिंग और पैकेजिंग बंद होने के बाद कर्मियों को रोजगार छीनने की चिंता सता रही है। क्वालिटी कन्ट्रोलर जगतशरण सिंह कहते हैं कि साल में तीन माह ही काम मिलता है। प्रोसेसिंग बंद होते ही कर्मियों को कार्य मुक्त करते हुए वेतन भी बंद कर दिया जाता है। अधिकारियों द्वारा कहा गया था कि सीजन में नीरा तो अन्य दिनों में चिल्ली और टोमेटो सॉस बनाया जाएगा। लेकिन, कुछ नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में किया प्रचारित

 बिहार सरकार ने नीरा उत्पादन को लेकर कई सारी योजनाएं बनाई थी। यहां तक कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ड्रीम प्रोजेक्ट भी बताया गया। जिसके कारण पहला प्लांट उनके ही गृह जिले में स्थापित किया गया। लेकिन अधूरी तैयारी, लोगों में बिना सर्वे के ही इस प्लांट पर पैसा बहाया गया। जबकि किसी भी नये प्रोडक्ट को लांच करने से पहले लोगों में उसे वितरित कर उसकी क्वालिटी को लेकर सर्वे किया जाता है। यहां जल्दबाजी में सरकार ने एक बार फिर वहीं गलती दोहरा दी, जो दूसरे प्रोजेक्ट में करती रही है। नतीजा प्लांट में उत्नपादन 24 दिन में ही बंद हो गया।

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