राजद में अब लालू-तेजस्वी ही होंगे सर्वेसर्वा, पार्टी को टूट से बचाने के लिए संविधान में किया गया बड़ा बदलाव

राजद में अब लालू-तेजस्वी ही होंगे सर्वेसर्वा, पार्टी को टूट से बचाने के लिए संविधान में किया गया बड़ा बदलाव

NEW DELHI : राजद के दो दिन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जहां लालू प्रसाद की लगातार 12वीं बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में ताजपोशी के कारण जितनी चर्चा में नहीं रही, उससे ज्यादा इससे जुड़े दूसरे मामले के कारण मिली। शुरूआत पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह की नाराजगी से हुई, उन्होंने पूरी बैठक का ही बहिष्कार कर दिया। साथ ही अपना इस्तीफा भी भेज दिया। इसके बाद तेज प्रताप और श्याम रजक के बीच विवाद हो गया। ऐसा लगा कि राजद में एकजुटता की जगह अब टूट की स्थिति उत्पन्न होने लगी है।  ऐसे में राजनीति के माहिर माने जानेवाले लालू प्रसाद ने एक बड़ा दांव चल दिया है।

जगदानंद का इस्तीफा, तेज के बागी सुर... को देखते हुए लालू प्रसाद ने राजद के संविधान में ही बड़ा बदलाव कर दिया है, जिसके बाद अब तेजस्वी यादव को बड़े अधिकार दे दिए गए हैं। जिसमें तेजस्वी के पास इस बात का अधिकार होगा कि  राजद का नाम और सिंबल बदल सकेंगे। इस महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव के बाद अब पार्टी का नाम (राजद) या चुनाव चिह्न (लालटेन) से संबंधित मामलों में अंतिम निर्णय लालू यादव या तेजस्वी यादव लेंगे। इस आशय का संविधान संशोधन प्रस्ताव सोमवार को दिल्ली में आयोजित राजद के राष्ट्रीय अधिवेशन में सर्वसम्मति से पारित कराया गया।

संविधान में यह हुआ बदलाव

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने राष्ट्रीय जनता दल के संविधान एवं नियम के धारा-35 के अंतर्गत संविधान में परिवर्तन करने के अधिकार के तहत पार्टी संविधान के नियम की धारा 30 में जोड़ने यानी संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया।प्रस्ताव में कहा गया कि राजद के नाम या इसके चुनाव चिह्न (लालटेन) से संबंधित और अन्य जुड़े हर मामले में अंतिम निर्णय राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव और सम्मानित नेता तेजस्वी प्रसाद यादव का ही होगा। लालू मंगलवार को सिंगापुर जायेंगे। उनकी तबीयत लगातार ख़राब चल रही थी।

इसलिए किया गया संविधान में बदलाव

 राजद के जानकारों की माने तो लालू के लगातार अस्वस्थ रहने के कारण तेजस्वी को पार्टी का सर्वेसर्वा बनाने के पीछे की मंशा ये है कि लालू के राजनीतिक आभामंडल के कमजोर पड़ते ही शिवसेना की तरह राजद को तोड़ने की कोशिश की जाये तो उस आकस्मिक स्थिति में तेजस्वी पार्टी के पक्ष में तुरंत निर्णय ले सके। 

वहीं दूसरा कारण यही नहीं राज्य में किसी अन्य तरह की अचानक राजनीतिक परिस्थिति आ जाये तो तेजस्वी को तेजी से निर्णय लेने में पार्टी संविधान या नियम किसी तरह का आड़े न आये। सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ने वाली पार्टियों के साथ आने वाले चुनावों में किस तरह का गठबंधन करना है इसके लिए तेजस्वी को पूरा पावर दे दिया गया है।



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